Sunday, 31 July 2011


भारत पाक अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर बीओपी 814 के पास प्यास बुझाने के लिए विचरण करते हिरण। सरहदी गांवों में सूखे की मार के चलते मानसून की पहली बारिश के अभाव में वन्य जीवों के हलक सूख रहे हैं। शनिवार को भरी दुपहरी में सरहद के उस पार पानी की आस से भटकते हिरणों का दृश्य।

Thursday, 23 June 2011

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ गुफ़्तगू .....

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ गुफ़्तगू ..... (कुछ सवालों के जवाब जो अब तक मिले नहीं....)

Monday, 20 June 2011

With Swaroop khan indian idol 4


on the fire...


i am with Raja hasan


Dr. kumar vishwas

एक चेहरा था ,दो आखें थीं ,हम भूल पुरानी कर बैठे .
एक किस्सा जी कर खुद को ही, हम एक कहानी कर बैठे ...

हम तो अल्हड-अलबेले थे ,खुद जैसे निपट अकेले थे ,
मन नहीं रमा तो नहीं रमा ,जग में कितने ही मेले थे ,
पर जिस दिन प्यास बंधी तट पर ,पनघट इस घट में अटक गया .
एक इंगित ने ऐसा मोड़ा,जीवन का रथ, पथ भटक गया ,
जिस "पागलपन" को करने में ज्ञानी-ध्यानी घबराते है ,
वो पागलपन जी कर खुद को ,हम ज्ञानी-ध्यानी कर बैठे.
एक चेहरा था ,दो आखें थीं ,हम भूल पुरानी कर बैठे .
एक किस्सा जी कर खुद को ही, हम एक कहानी कर बैठे .

परिचित-गुरुजन-परिजन रोये,दुनिया ने कितना समझाया
पर रोग खुदाई था अपना ,कोई उपचार ना चल पाया ,
एक नाम हुआ सारी दुनिया ,काबा-काशी एक गली हुई,
ये शेरो-सुखन ये वाह-वाह , आहें हैं तब की पली हुई
वो प्यास जगी अन्तरमन में ,एक घूंट तृप्ति को तरस गए ,
अब यही प्यास दे कर जग को ,हम पानी-पानी कर बैठे .
एक चेहरा था ,दो आखें थीं ,हम भूल पुरानी कर बैठे .

एक किस्सा जी कर खुद को ही, हम एक कहानी कर बैठे .
क्या मिला और क्या छूट गया , ये गुना-भाग हम क्या जाने ,
हम खुद में जल कर निखरे हैं ,कुछ और आग हूँ क्या जाने ,
सांसों का मोल नहीं होता ,कोई क्या हम को लौटाए ,
जो सीस काट कर हाथ धरे , वो साथ हमारे आ जाए ,
कहते हैं लोग हमें "पागल" ,कहते हैं नादानी की है ,
हैं सफल "सयाना" जो जग में , ऐसी नादानी कर बैठे
एक चेहरा था ,दो आखें थीं ,हम भूल पुरानी कर बैठे .
एक किस्सा जी कर खुद को ही, हम एक कहानी कर बैठे !!

Sunday, 5 June 2011

अब दो और बयान

आज लालू प्रसाद यादव ने अनर्गल बयान मीडिया को दिया हैं लेकिन एक सीक्रेट बात कह रहा हूँ  लालू जी सावधान बाबा रामदेव अगली बार एक मुद्दा उठा रहे हैं की जो घोटालो के कारण ज़ैल जा चुके हैं वो जनप्रतिनिधि के रूप में चुनाव नहीं लड़ सकते !!! अब दो और बयान  

Tuesday, 31 May 2011

इंद्रप्रस्थ

यह है इंद्रप्रस्थ का इंद्रजाल 
इसमें भूखी-नंगी जनता सुनहरे सपने देखती है 
और महारानी के दर्शन भर से धन्य हो जाती है । 
ग़रीब जनता गौर से निहारती है महारानी को 
उनमें उसे सत्यहरिश्चंद्र की आत्मा नज़र आती है
उसे लगता है वे महारानी नहीं, सत्य हरिश्चंद्र की नया अवतार हैं

इंद्रप्रस्थ की रानी कहती है देश में भ्रष्टाचार बढ़ गया 
करोड़पतियों की संख्या तो बढ़ी 
ग़रीबों की आबादी में भी इजाफ़ा हुआ 
रानी कहती है ग़रीबी और भ्रष्टाचार बेहद चिंता की बात 
जनता जवाब नहीं माँगती 
वह तो मंत्रमुग्ध है उनके सम्मोहन में

ऋषियों का यह देश चाणक्य का भी है
चंद्रगुप्त का भी 
सपने तो टूट ही रहे हैं
जिस दिन टूटेगा इंद्रजाल जनता पूछेगी
रानी जी! फिर कलमाड़ी को क्यों बचाया ?
और राजा को क्यों हटाया?
महारानी जी! थरूर पर हुई थू-थू 
फिर भी कम नही हुई मनमोहन की मुस्कान 
ये सब के सब तो आप के ही प्यादे हैं न 
राज आपका 
बिसात आपकी प्यादे आपके 
संविधान में सरकार भले ही चलती है संसद से 
हक़ीक़त यह है कि दस जनपथ की इच्छा के बिना 
सात रेस कोर्स का पत्ता तक नहीं हिलता 

रानी जी, पूरा देश जानता है 
आपकी मुस्कान से ही मुस्कुराते हैं करोड़पति-अरबपति
आपके चहकने से आमजन हो जाता है मायूस 
दरअसल सिर्फ़ कहने को जनपथ में रहती हैं आप 
भले ही इस देश में आपका अपना कोई घर-बार नहीं
हक़ीक़त में आप राजपथ की रानी हैं 
तौर-तरीके और रहन-सहन से तो यही लगता है
आप इंद्रप्रस्थ की महारानी हैं । 
 
समय आने दीजिए महारानी जी! 
भूखी-नंगी जनता करेगी आपकी करतूतों का पूरा हिसाब 
पूछेगी क्या हुआ अफ़ज़ल का, कहाँ है कसाब ?  
पूछेगी क्या संसद से भी बड़ा है होटल ताज ? 
महारानी जी यही है आपका राज ? 
 
ज़रूर टूटेगा एक दिन इंद्रजाल 
और भूखी-नंगी जनता को लगेगा 
आपमें नहीं बसती है सत्य हरिश्चंद्र की आत्मा ।

कबीर दोहावली

दुख में सुमरिन सब करे, सुख मे करे न कोय ।
जो सुख मे सुमरिन करे, दुख काहे को होय ॥ 1 ॥


तिनका कबहुँ न निंदिये, जो पाँयन तर होय ।
कबहुँ उड़ आँखिन परे, पीर घनेरी होय ॥ 2 ॥


माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार दें, मन का मनका फेर ॥ 3 ॥


गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय ॥ 4 ॥


बलिहारी गुरु आपनो, घड़ी-घड़ी सौ सौ बार ।
मानुष से देवत किया करत न लागी बार ॥ 5 ॥


कबिरा माला मनहि की, और संसारी भीख ।
माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख ॥ 6 ॥


सुख मे सुमिरन ना किया, दु:ख में किया याद ।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥ 7 ॥


साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥ 8 ॥


लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट ।
पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥ 9 ॥


जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान ।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ॥ 10 ॥


जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप ।
जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप ॥ 11 ॥


धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥ 12 ॥


कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥ 13 ॥


पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय ।
एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय ॥ 14 ॥


कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान ।
जम जब घर ले जायेंगे, पड़ी रहेगी म्यान ॥ 15 ॥


शीलवन्त सबसे बड़ा, सब रतनन की खान ।
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ॥ 16 ॥


माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥ 17 ॥


माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय ॥ 18 ॥


रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीना जन्म अनमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥ 19 ॥


नींद निशानी मौत की, उठ कबीरा जाग ।
और रसायन छांड़ि के, नाम रसायन लाग ॥ 20 ॥


जो तोकु कांटा बुवे, ताहि बोय तू फूल ।
तोकू फूल के फूल है, बाकू है त्रिशूल ॥ 21 ॥


दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार ।
तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे डार ॥ 22 ॥

आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर ।
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बँधे जात जंजीर ॥ 23 ॥


काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब ॥ 24 ॥


माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख ।
माँगन से तो मरना भला, यह सतगुरु की सीख ॥ 25 ॥


जहाँ आपा तहाँ आपदां, जहाँ संशय तहाँ रोग ।
कह कबीर यह क्यों मिटे, चारों धीरज रोग ॥ 26 ॥


माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय ।
भगता के पीछे लगे, सम्मुख भागे सोय ॥ 27 ॥


आया था किस काम को, तु सोया चादर तान ।
सुरत सम्भाल ए गाफिल, अपना आप पहचान ॥ 28 ॥


क्या भरोसा देह का, बिनस जात छिन मांह ।
साँस-सांस सुमिरन करो और यतन कुछ नांह ॥ 29 ॥


गारी ही सों ऊपजे, कलह कष्ट और मींच ।
हारि चले सो साधु है, लागि चले सो नींच ॥ 30 ॥


दुर्बल को न सताइए, जाकि मोटी हाय ।
बिना जीव की हाय से, लोहा भस्म हो जाय ॥ 31 ॥


दान दिए धन ना घते, नदी ने घटे नीर ।
अपनी आँखों देख लो, यों क्या कहे कबीर ॥ 32 ॥


दस द्वारे का पिंजरा, तामे पंछी का कौन ।
रहे को अचरज है, गए अचम्भा कौन ॥ 33 ॥


ऐसी वाणी बोलेए, मन का आपा खोय ।
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय ॥ 34 ॥


हीरा वहाँ न खोलिये, जहाँ कुंजड़ों की हाट ।
बांधो चुप की पोटरी, लागहु अपनी बाट ॥ 35 ॥


कुटिल वचन सबसे बुरा, जारि कर तन हार ।
साधु वचन जल रूप, बरसे अमृत धार ॥ 36 ॥


जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय ।
यह आपा तो ड़ाल दे, दया करे सब कोय ॥ 37 ॥


मैं रोऊँ जब जगत को, मोको रोवे न होय ।
मोको रोबे सोचना, जो शब्द बोय की होय ॥ 38 ॥


सोवा साधु जगाइए, करे नाम का जाप ।
यह तीनों सोते भले, साकित सिंह और साँप ॥ 39 ॥


अवगुन कहूँ शराब का, आपा अहमक साथ ।
मानुष से पशुआ करे दाय, गाँठ से खात ॥ 40 ॥


बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन के साथ ।
नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ ॥ 41 ॥


अटकी भाल शरीर में तीर रहा है टूट ।
चुम्बक बिना निकले नहीं कोटि पटन को फ़ूट ॥ 42 ॥


कबीरा जपना काठ की, क्या दिख्लावे मोय ।
ह्रदय नाम न जपेगा, यह जपनी क्या होय ॥ 43 ॥


पतिवृता मैली, काली कुचल कुरूप ।
पतिवृता के रूप पर, वारो कोटि सरूप ॥ 44 ॥

बैध मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार ।
एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार ॥ 45 ॥


हर चाले तो मानव, बेहद चले सो साध ।
हद बेहद दोनों तजे, ताको भता अगाध ॥ 46 ॥


राम रहे बन भीतरे गुरु की पूजा ना आस ।
रहे कबीर पाखण्ड सब, झूठे सदा निराश ॥ 47 ॥


जाके जिव्या बन्धन नहीं, ह्र्दय में नहीं साँच ।
वाके संग न लागिये, खाले वटिया काँच ॥ 48 ॥


तीरथ गये ते एक फल, सन्त मिले फल चार ।
सत्गुरु मिले अनेक फल, कहें कबीर विचार ॥ 49 ॥


सुमरण से मन लाइए, जैसे पानी बिन मीन ।
प्राण तजे बिन बिछड़े, सन्त कबीर कह दीन ॥ 50 ॥


समझाये समझे नहीं, पर के साथ बिकाय ।
मैं खींचत हूँ आपके, तू चला जमपुर जाए ॥ 51 ॥
हंसा मोती विण्न्या, कुञ्च्न थार भराय ।
जो जन मार्ग न जाने, सो तिस कहा कराय ॥ 52 ॥


कहना सो कह दिया, अब कुछ कहा न जाय ।
एक रहा दूजा गया, दरिया लहर समाय ॥ 53 ॥


वस्तु है ग्राहक नहीं, वस्तु सागर अनमोल ।
बिना करम का मानव, फिरैं डांवाडोल ॥ 54 ॥


कली खोटा जग आंधरा, शब्द न माने कोय ।
चाहे कहँ सत आइना, जो जग बैरी होय ॥ 55 ॥


कामी, क्रोधी, लालची, इनसे भक्ति न होय ।
भक्ति करे कोइ सूरमा, जाति वरन कुल खोय ॥ 56 ॥


जागन में सोवन करे, साधन में लौ लाय ।
सूरत डोर लागी रहे, तार टूट नाहिं जाय ॥ 57 ॥


साधु ऐसा चहिए ,जैसा सूप सुभाय ।
सार-सार को गहि रहे, थोथ देइ उड़ाय ॥ 58 ॥


लगी लग्न छूटे नाहिं, जीभ चोंच जरि जाय ।
मीठा कहा अंगार में, जाहि चकोर चबाय ॥ 59 ॥


भक्ति गेंद चौगान की, भावे कोई ले जाय ।
कह कबीर कुछ भेद नाहिं, कहां रंक कहां राय ॥ 60 ॥


घट का परदा खोलकर, सन्मुख दे दीदार ।
बाल सनेही सांइयाँ, आवा अन्त का यार ॥ 61 ॥


अन्तर्यामी एक तुम, आत्मा के आधार ।
जो तुम छोड़ो हाथ तो, कौन उतारे पार ॥ 62 ॥


मैं अपराधी जन्म का, नख-सिख भरा विकार ।
तुम दाता दु:ख भंजना, मेरी करो सम्हार ॥ 63 ॥


प्रेम न बड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय ।
राजा-प्रजा जोहि रुचें, शीश देई ले जाय ॥ 64 ॥


प्रेम प्याला जो पिये, शीश दक्षिणा देय ।
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय ॥ 65 ॥


सुमिरन में मन लाइए, जैसे नाद कुरंग ।
कहैं कबीर बिसरे नहीं, प्रान तजे तेहि संग ॥ 66 ॥


सुमरित सुरत जगाय कर, मुख के कछु न बोल ।
बाहर का पट बन्द कर, अन्दर का पट खोल ॥ 67 ॥


छीर रूप सतनाम है, नीर रूप व्यवहार ।
हंस रूप कोई साधु है, सत का छाननहार ॥ 68 ॥

हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला ! / 'मनुज' देपावत

हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में ।

था एक दिवस जब तेरे इस आँगन में फूली अमराई !
था एक दिवस जब मेरे भी मन में झूमी थी तरुणाई !
पीपल की फुनगी पर बोली, पंचम स्वर में कोयल काली !
मादक मधु-ऋतु के स्वागत में, कोसों तक फैली हरियाली !
पावस की मतवाली संध्या, आती अम्बर से उतर-उतर !
उन खेतों की पगडंडी पर, वह बैलों की घंटी का स्वर !
फिर तीजों का त्यौहार सुखद, सखियों के मादक गीत मधुर !
झूलों के मस्त झकोरों पर, जाते उर के अरमान बिखर !

तुम इन्द्रपुरी से सुन्दर थे मेरे मरुधर के सुखद ग्राम !
तेरे रेतीले धोरों पर उल्लास बिछाती सुबह शाम !
किस्मत की मिटी लकीरों से, रे, आज कहाँ वे दिन बीते!
जगती के विष की तुलना में, ये जीवन के मधुघट रीते !

अरमान सुलगते शोलों से , मानव मन के अवसादों में ! हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में ।

क्या तुझे सुनाऊँ आज सखे ! ये पीड़ा के पहचाने हैं !
ये दग्ध-ह्रदय के छले हैं, ये दर्द भरे अफ़साने हैं !
यह ज़ुल्म ज़मीदारों का है, यह धनिकों की मनमानी है !
बेकस किसान के जीवन की, यह जलती हुई कहानी है !
क्या कभी सुना भी है तुमने ! मानव मानव को खाता है !
पीकर लोहू चटकार जीभ, फिर हँसकर दाँत दिखाता है !
ये ज़मींदार कहलाते हैं, मूँछों पर ताव लगाते हैं !
सौ-सौ को साथ डकार जाएँ, पर कभी डकार ना खाते हैं !

पर इनको कौन कहे ज़ालिम, ये शोषक सत्ताधारी हैं !
इनकी उस ईश्वर के स्वरूप राजा से रिश्तेदारी है !
इनकी वह लाल हवेली है, अम्बर में ऊँचा शीश किए !
इन कंगालों की कुटिया का जो आँखों में उपहास लिए !

वह रात मनाती रंगरलियाँ, मधु-प्यालों के आह्लादों में ! हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में ।

कर्मठ किसान के खेतों पर, आतंक ध्वजा फहराती है !
इनके वे टैक्स-लगान देख कर मानवता थर्राती है !
"भूंगे" का भूत लगा सिर पर, आँखों में क्रूर विनाश लिए !
बेदख़ली के बादल छाए, बस महाप्रलय का श्वास लिए !
बेगार प्रथा की बाँहों में जीवन की साध सिसकती है !
नंगे-भूखों की आँहों में आँखों की आग बरसती है !
ये जान सकेंगे कभी नहीं, इस जगती का वैभव क्या है !
कोई इनसे जाकर पूछे, दो पैरों का मानव क्या है ?

मानव मिट्टी का रोड़ा है, बस, जब चाहा तब तोड़ दिया !
मानव टम-टम का घोड़ा है, बस, जब चाहा तब जोड़ दिया !
वह नाबदान का कीड़ा है, किलबिल करता है सुबह-शाम !
वह पूँछ हिलाता कुत्ता है, अपने मालिक का चिर-ग़ुलाम !

वह अपनी हस्ती बेच चुका, अपने मालिक के हाथों में ! हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में ।

पर कौन यहाँ सुनने वाला, वे तो मस्ती में गाते हैं !
कंगाल खड़े हैं यहाँ इधर, पर वे मधु-रात मनाते हैं !
वे उस दूकान पर जाते हैं, जिस पर यौवन बिकता रहता !
पैसे-पैसे के बदले में जो मिट्टी में मिलता रहता !
उनके वे काग़ज़ के टुकड़े, उस ज्वाला में जल जाते हैं !
बरसों से मिले हुए मोती, उस पानी में घुल जाते हैं !
उद्दाम वासना का यौवन, उस धारा में बह जाता है !
नारी का नंगा तन झकोर, वह काँप-काँप रह जाता है !

फिर भी वे अपनी सत्ता का, कुछ सार जमाने वाले हैं !
कंगलों के झूठे टुकड़ों पर, अधिकार जमाने वाले हैं !
यह मानव की दुनिया कठोर, यह मानव का संसार विषम !
दुर्बल के निर्बल कन्धों पर, दुस्साह जीवन का भार विषम !

वह राग बेबसी का उठता, महफ़िल के मधुर निनादों में ! हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में ।

मेरी पहचान रहेगी मेरे अफसानों में / श्रद्धा जैन

जैसे होती थी किसी दौर में, हैवानों में
बेसकूनी है वही आज के इंसानों में

जल्द उकताते हैं हर चीज़ से, हर मंजिल से
ये परिंदों की सी आदत भी है दीवानों में

उम्र भर सच के सिवा कुछ न कहेंगे, कह कर
नाम लिखवा लिया अब हमने भी नादानों में

जिस्म दुनिया में भी जन्नत के मज़े लेता रहा
रूह इक उम्र भटकती रही वीरानों में

उसकी मेहमान नवाजी की अदाएं देखीं
हम भी सकुचाए से बैठे रहे बेगानों में

नाम, सूरत तो हैं पानी पे लिखी तहरीरें
मेरी पहचान रहेगी मेरे अफसानों में

झूठ का ज़हर समाअत से उतर जाएगा
बूंद सच्चाई की उतरे तो मेरे कानों में

जो भी होना है वो निश्चित है, अटल है ‘श्रद्धा’
क्यूँ न कश्ती को उतारे कभी तूफानों में

सीमावर्ती क्षेत्र में पानी का बंटवारा

 राजस्थान में  बाड़मेर जिले के  सीमावर्ती खबड़ाला गांव की सरकारी पानी की हौदी में महीने में तीन बार ही पानी आता है। इस से जुड़े दस  गांवों के लोगों ने आपस में कलह  को रोकने के लिए पानी का ही बंटवारा कर दिया है। लिहाजा अब महीने में  तीन दिन आने वाले पानी  में बारी-बारी से चार-चार गांव पानी ले रहे है । शेष 29 दिन पानी के लिए ग्रामीण मीलों सफर कर रहे हैं।
  भारत पाकिस्तान की सरहद पर बसें बाड़मेर जिले के  सबसे दुर्गम ग्राम पंचायत खबडाला में गत दो सालों से पानी की भारी किल्लत झेलनें के बाद गांव में पानी को लेकर खिंचने वाली तलवारों पर लगाम कसकर ग्रामीणों ने आपसी सहमती बना कर प्रत्येक गांव में पानी का बंटवारा कर दिया है खबडाला के बुजर्ग  रतन सिंह सोढा  के अनुसार  विगत तीन सालों से खबडाला ग्राम पंचायत सहित बचिया,पूंजराज का पार,सगरानी,पिपरली,द्राभा,गारी,मणिहारी सहित 94 गांवों में पेयजल की जबरदस्त किल्लत के चलतें ग्रामीणें के सामने बडी समस्या खडी हो गई। पुराने होदी में महीने में तीन चार दिन पानी आता है  आपूर्ति के समय आसपास के गांवों के ग्रामीण भी पानी भरने आते हैं इतना कम पानी हमारे एक गांव की भी प्यास नहीं बुझा पाता ऐसे में दूसरे गांवों के लोगों को कैसे पानी भरने दे।इसी बात को लेकर गांवों के बीच झगडे भी होने लगे।कई बार तलवारें भी  ।रोज रोज की पेशानी   सें निपटने के लिऐं ग्रामीणों नें सर्व सम्मति से ग्राम पंचायत के दस  गावो की  समझौता बैठक बुला कर पानी का बंअवारा करने का निर्णय लिया गया। यह पानी उठों के माध्यम से बाटा जा रहा है
. रतन सिंह सोढा  निवासी ,खबडाला गाव के अनुसार  विगत तीन सालों से खबडाला ग्राम पंचायत सहित बचिया,पूंजराज का पार,सगरानी,पिपरली,द्राभा,गारी,मणिहारी सहित 94 गांवों में पेयजल की जबरदस्त किल्लत के चलतें ग्रामीणें के सामने बडी समस्या खडी हो गई। पुराने होदी में महीने में तीन चार दिन पानी आता है  आपूर्ति के समय आसपास के गांवों के ग्रामीण भी पानी भरने आते हैं इतना कम पानी हमारे एक गांव की भी प्यास नहीं बुझा पाता ऐसे में दूसरे गांवों के लोगों को कैसे पानी भरने दे।इसी बात को लेकर गांवों के बीच झगडे भी होने लगे।कई बार तलवारें भी  ।रोज रोज की पेशानी   सें निपटने के लिऐं ग्रामीणों नें सर्व सम्मति से ग्राम पंचायत के दस  गावो की  समझौता बैठक बुला कर पानी का बंअवारा करने का निर्णय लिया गया। पास के गाव सगरानी   के रहने वाले  मोकम सिंह के अनुसार पानी को लेकर राज झगडा हो जाता है कुछ दिन पहले है अपनी को लेकर सभी गाव में कलह हो गई फिर हमने पानी के बटवारा कर दिया हमारे यह पानी की भयकर किल्लत है आने वाले दिनों यहाँ पर पानी की कमी के चलते जानवर मर जाएगे
चुकी देवी के अनुसार गाव में पानी के लिए लड़ाई रोज होती है और अब पानी का बटवारा कर दिया है  अभी तक हम कई किलोमीटर दूर जाकर पानी लाते है    मोकम सिंह निवासी . सगरानी गाव के अनुसार  पानी को लेकर राज झगडा हो जाता है कुछ दिन पहले है अपनी को लेकर सभी गाव में कलह हो गई फिर हमने पानी के बटवारा कर दिया हमारे यह पानी की भयकर किल्लत है आने वाले दिनों यहाँ पर पानी की कमी के चलते जानवर मर जाएगे
  चुकी देवी ,निवासी ,सगरानी गाव के अनुसार  गाव में पानी के लिए लड़ाई रोज होती है और अब पानी का बटवारा कर दिया है  अभी तक हम कई किलोमीटर दूर जाकर पानी लाते .
इन गावो में ओरतो के साथ छोटे छोटे बच्चे कई मील दूर चलकर लाते है अब यह हाल है की पानी के सभी साधन सुख गए है लिहाजा अब गाव की ओरते को बिना पानी लिए है लोटना पड़ रहा है सबसे बड़ा सवाल यह है अब यह हाल है तो मई और जून महीने में इन गावो के क्या हाल होगे

Monday, 30 May 2011

रहस्यमय शब्द !

आज तुम फिर बिसराओगे ,
समझते हुए भी न समझोगे ,
कहीं दूर टकटकी लगाओगे,
विशाल क्षितिज के उस पार,
दृष्टि तुम्हारी भेदती सी ,
अनंत काल के रहस्य को !
किन्तु फिर वही,फिर वही
झंझावातों में फंसकर ,
तुम फिर अनवरत प्रयासरत ,
अपनी स्थितप्रज्ञता के लिए ,
वही गीता या योग वशिष्ठ ,
तुम्हारे झरे स्वप्नों को
थामते-थामते ,
फिर वही सशक्त ,
रहस्यमय शब्द !
क्योंकि रहस्य ही
तो पूर्ण सौंदर्य है !

आदत तो न थी

खाली रास्तों को
निहारना मेरी आदत तो न थी
खाली पनों को
स्याह करना मेरी फितरत तो न थी
खाली चेहरों में
रंग भरना मेरी तमन्ना
तो न थी
खाली शब्दों से
जुबां को जोड़ना मेरी हसरत तो न थी
खाली नज़रों से
ख्वाबो को बुनना मेरी आरज़ू तो न थी
खाली पलकों से
आंसू में मुस्कुराना मेरी अदा तो न थी
खाली रास्तों से
खाली पनों से
खाली चेहरों से
खाली शब्दों से
खाली नज़रों तक
जब न थी कोई
आदत न फितरत
न तमन्ना न हसरत
न आरज़ू न अदा ,
फिर है ये जाल कौन सा
तकदीर का
जिस में उलझता ही
जाता है जीवन
हर साँझ थोडा
हर रात थोडा

रातें हैं उदास दिन कड़े हैं

रातें हैं उदास दिन कड़े हैं,
ऐ दिल तेरे हौसले बड़े हैं

ऐ यादे-हबीब साथ देना,
कुछ मरहले सख़्त आ पड़े हैं
...
रूकना हो अगर तो सौ बहाने,
जाना हो तो रास्ते बड़े हैं

अब किसे बतायें वजहे-गिरीया,
जब आप भी साथ रो पड़े हैं

अब जाने कहाँ नसीब ले जायें,
घर से तो ‘फ़राज़’ चल पड़े हैं

फफोला

सुनो !
तुम्हारे खयालो में गुम
आज,गरम पतीले से
ऊँगली जल गई
फफोला निकल आया है
...उसे मसलकर नमक लगा दूँ
कम स कम ...आज !
तुम्हारी यादों के जख्म
दर्द तो ना देंगे ......!!

bahana

मैं व्रत रख रहा हूँ, तुम भी रखो, कहकर छिपकर खाना सबसे बड़ा धोखा है. लोग अपनी सारी जिंदगी इसी प्रकार के अनेक धोखे देते रहते हैं. मातहतों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाकर खुद मोटी रिश्वत लेना, कार्यकर्ताओं को मरने को आगे कर खुद भेस बदलकर भागना, पत्नी-बच्चों को चरित्र पर भाषण देकर खुद लंपटता से जीना.. आदि ऐसे ही उदाहरण हैं. आपके पास कोई उदाहरण है?

Saturday, 2 April 2011

टीम इंडिया ने जीता वर्ल्डकप, पूरा हुआ भगवान का सपना




गौतम गंभीर (97 रन) और कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की नाबाद अर्धशतकीय कप्तानी पारी के दम पर टीम इंडिया ने 28 साल बाद मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में एक नया इतिहास रच दिया है। आईसीसी क्रिकेट वर्ल्डकप 2011 के खिताबी मुकाबले में भारत ने श्रीलंका को 6 विकेट से हराने के साथ वर्ल्डकप खिताब पर भी कब्जा जमा लिया।

ये टीम इंडिया का दूसरा वर्ल्डकप है। धोनी के धुरंधरों ने 28 साल बाद वो कर दिखाया जो 1983 में कपिल देव एंड कंपनी ने इंग्लैंड में किया था। कप्तान धोनी ने शानदार पारी खेलते हुए नाबाद 91 रन बनाए। मैच के 48.2 ओवर में धोनी ने छक्का जमाकर भारत को ऐतिहासिक जीत दिलाई।

इस जीत के साथ ही टीम इंडिया का वनडे रैंकिंग में नंबर 1 बनना पक्का हो गया है।
भारत की इस ऐतिहासिक जीत के हीरो गौतम गम्भीर रहे जिन्होंने 97 रनों की साहसिक पारी खेली। विराट कोहली (35) के साथ तीसरे विकेट के लिए 83 रन जोड़कर भारत को वीरेंद्र सहवाग (0) और सचिन तेंदुलकर (18) के आउट होने से झटके से उबारने वाले गम्भीर ने कप्तान धौनी के साथ चौथे विकेट के लिए 109 रन जोड़कर टीम को जीत की दहलीज तक पहुंचा दिया। गम्भीर और धौनी ने विश्व कप फाइनल के इतिहास में भारत की ओर से अब तक की सबसे बड़ी साझेदारी को अंजाम दिया।

गम्भीर, धौनी और कोहली की शानदार पारियों की बदौलत भारत ने 275 रनों के लक्ष्य को 48.2 ओवरों में चार विकेट खोकर हासिल कर लिया। गम्भीर ने अपनी 122 गेंदों की पारी में नौ चौके लगाए। वह जब आउट हुए थे तब भारत को जीत के लिए 53 रनों की जरूरत थी। दूसरी ओर, धौनी 91 रन बनाकर विश्व कप में एक बल्लेबाज के तौर पर अपनी अब तक की नाकामी को धो दिया। उनके साथ युवराज सिंह 21 रनों पर नाबाद रहे।

इस तरह श्रीलंकाई टीम का 1996 के बाद दूसरी बार विश्व चैम्पियन बनने और अपने महानतम गेंदबाज मुथैया मुरलीधन को खिताबी विदाई देने का सपना धरा का धरा रह गया। अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में 1300 से अधिक विकेट ले चुके मुरलीधरन ने इस मैच के साथ अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले लिया है।

इससे पहले, पूर्व कप्तान माहेला जयवर्धने (नाबाद 103) द्वारा सलीके से तराशी गई शतकीय पारी की बदौलत श्रीलंका भारत के सामने 275 रनों का अपेक्षाकृत चुनौतीपूर्ण लक्ष्य रखा। टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी श्रीलंकाई टीम ने बेशक शुरुआत के अनिवार्य बैटिंग पावरप्ले में सिर्फ 31 रन जुटाए थे लेकिन उसने इसकी भरपाई अंतिम पाररप्ले के दौरान 63 रन जुटाकर कर ली।

थिसरा परेरा ने जहीर खान के अंतिम दो ओवरों में 17 और 18 रन जोड़ते हुए अपनी टीम को सम्मानजनक योग तक पहुंचा दिया। जयवर्धने के नेतृत्व में श्रीलंकाई बल्लेबाजों ने खराब शुरुआत और उसके बाद भारतीय गेंदबाजों की सधी गेंदबाजी के कारण सामने आई बेबसी को भुलाते हुए शानदार पारियां खेलीं और कम से कम 260 रनों की चुनौती पेश करने की उस बाधा को पार किया, जिसके बूते उनके गेंदबाज टीम के सम्मान की रक्षा कर सकती थी लेकिन भारतीय बल्लेबाजों का इरादा कुछ और ही था।

यह जयवर्धने की शतकीय पारी का ही प्रताप है कि 45 ओवरों तक 211 रन बनाने वाली श्रीलंकाई टीम निर्धारित 50 ओवरों में छह विकेट पर 274 रन बनाने में सफल रही। जयवर्धने ने 88 गेंदों पर 13 चौकों की मदद से 103 रन बनाए। इसके अलावा कप्तान कुमार संगकारा ने 48 और तिलकरत्ने दिलशान ने 33 रनों का योगदान दिया।

थिलन समरवीरा ने 21 रन बनाए और नुवान कुलासेकरा तथा परेरा ने अंतिम समय में जयवर्धने के साथ शानदार साझेदारियां निभाते हुए क्रमश: 66 और नाबाद 26 रन जोड़े। कुलासेकरा ने 30 गेदों पर एक चौके और एक छक्के की मदद से 32 रन बनाए जबकि परेरा नौ गेंदों पर तीन चौकों और जहीर की अंतिम गेंद पर लगाए गए छक्के की मदद से 22 रन जोड़े।

भारत की ओर से इस विश्व कप में कुल 21 विकेट झटककर पाकिस्तान के कप्तान शाहिद अफरीदी की बराबरी करने वाले जहीर खान और युवराज सिंह ने इस मैच में दो-दो विकेट लिए। जहीर ने अपने शुरुआती सात ओवरों में सिर्फ 16 रन दिए थे लेकिन 10वे ओवर की समाप्ति तक वह 60 रन लुटा चुके थे। हरभजन सिंह को भी एक सफलता मिली। कुलासेकरा रन आउट हुए।
सचिन, धोनी, युवराज, हरभजन समेत कई खिलाड़ियों की आंखों से बहे खुशी के आंसू



किसने जीता टॉस!

वर्ल्डकप फाइनल का टॉस हास्यास्पद रहा। सिक्का उछाला गया, संगकारा ने हैड्स कहा, पर इसे कोई नहीं सुन पाया। मैच रैफरी जैफ क्रो शोर के कारण संगकारा की आवाज नहीं सुन पाए, तो रवि शास्त्री सिक्के की तरफ देखने के कारण। इस हालत में टॉस फिर से किया गया और संगकारा ने उसे जीत लिया। टॉस के बाद सौरव गांगुली ने इसे कॉमेडी ऑफ एरर बताया।

छठे ओवर में लगा पहला चौका

श्रीलंकाई टीम को पहले चौके के लिए छठे ओवर तक इंतजार करना पड़ा। छठा ओवर कर रहे थे श्रीसंथ और ओवर की पहली गेंद पर दिलशान ने चौका लगाया। जहीर और श्रीसंथ ने 30 गेंदों तक श्रीलंका की रन गति पर अंकुश लगाए रखा था। इसी ओवर की तीसरी गेंद पर फिर चौका लगा।

दस ओवर में बने 31 रन

श्रीलंकाई बल्लेबाज शुरुआती 10 ओवरों में काफी दबाव में रहे। वे इस दौरान केवल 31 रन बना सके। भारतीय गेंदबाजों ने लाइन व लैंग्थ पर नियंत्रण रखा, जबकि युवराज व रैना की फील्डिंग शानदार रही।

महंगे साबित हुए श्रीसंथ

टूर्नामेंट के उद्घाटन मैच में बांग्लादेश के खिलाफ महंगे साबित हुए तेज गेंदबाज श्रीसंथ एक बार फिर प्रभाव नहीं छोड़ पाए। श्रीलंका ने जब 13 ओवर में 54 रन बनाए थे, तो इसमें से 33 रन श्रीसंथ के पांच ओवरों में बने थे।

रैफरल रास आया टीम को

शुरुआती मैचों में भले ही रैफरल सिस्टम टीम इंडिया को रास नहीं आया हो, लेकिन फाइनल में इसका फायदा मिला। 39वें ओवर में समरवीरा जब क्रीज पर जमते दिख रहे थे, तो युवराज ने उनके खिलाफ एलबीडब्ल्यू की अपील की। अंपायर साइमन टफैल ने उसे ठुकराया, तो टीम ने रैफरल लिया। थर्ड अंपायर ने टफैल के फैसले को बदलते हुए समरवीरा को आउट करार दिया।

युवी का मिडास टच

जब भी श्रीलंकाई पारी पटरी पर आती दिख रही थी, तो युवी का मिडास टच काम आया। संगकारा और जयवर्धने तीसरे विकेट के लिए 62 रन जोड़ चुके थे, तो युवी ने संगकारा को धोनी के हाथों कैच करा दिया। इसके बाद जयवर्धने और समरवीरा चौथे विकेट के लिए 57 रन की साझेदारी करते हुए टीम को संभालते दिख रहे थे, युवी ने समरवीरा को एलबीडब्ल्यू कर दिया।

पहला छक्का कुलसेकरा के नाम

श्रीलंका का पहला छक्का कुलसेकरा के नाम रहा। इसके लिए टीम को 48वें ओवर तक इंतजार करना पड़ा। गेंदबाज थे जहीर और कुलसेकरा ने बैटिंग पावर प्ले का लाभ उठाते हुए उनकी गेंद को दर्शकों में पहुंचा दिया।

पावर प्ले में छाया श्रीलंका

45 ओवर तक श्रीलंका का स्कोर था 5/211 रन। लग रहा था कि टीम 240 रन के आसपास पहुंचेगी, लेकिन बैटिंग पावर प्ले में खेल बदल गया। श्रीलंका ने पांच ओवरों में 63 रन बनाते हुए स्कोर को छह विकेट पर 274 रन तक पहुंचा दिया। 46वें ओवर में नौ रन, 47वें ओवर में 11 रन, 48वें ओवर में 17 रन, 49वें ओवर में आठ रन तथा 50वें ओवर में 18 रन बने।

तिसारा ने बरसाए रन

तिसारा परेरा ने अंतिम ओवरों में तूफानी बल्लेबाजी की। उन्होंने केवल नौ गेंदों का सामना किया और 22 रन पर अविजित रहे। इस दौरान उन्होंने तीन चौके व एक छक्का लगाया।

जयवर्धने की शाही पारी

जयवर्धने ने श्रीलंका के लिए शाही पारी खेली। वे 88 गेंदों पर 13 चौकों की मदद से 103 रन बनाकर नाबाद रहे। उन्होंने पारी को उस समय संभाला, जब टीम के पांच प्रमुख बल्लेबाज 182 रन तक पैवेलियन लौट चुके थे।

वीरू-सचिन के आउट होते ही सन्नाटा

प्रशंसकों को वीरेंद्र सहवाग और सचिन से आतिशी पारी की आस थी, लेकिन मलिंगा ने दूसरी गेंद पर ही वीरू को पैवेलियन लौटा दिया। मिडिल स्टंप पर पड़ी गेंद सहवाग के पैड्स पर लगी और मलिंगा की अपील पर अंपायर ने उंगली उठा दी। रैफरल मांगा गया, लेकिन फैसला बरकरार रहा। कुछ देर बाद ही सचिन भी मलिंगा का शिकार बन गए। इससे वानखेड़े स्टेडियम में सन्नाटा सा छा गया।

मोर्चा संभाला यूथ ब्रिगेड ने

दो धुरंधर बल्लेबाजों के आउट होने के बाद टीम इंडिया की यूथ ब्रिगेड ने मोर्चा संभाला और टीम को चैंपियन बनाकर ही दम लिया। गंभीर और धोनी के अलावा युवराज सिंह ने भी उल्लेखनीय योगदान दिया।




२८ साल में क्रिकेट का रंग भी बदला और रूप भी

समय के साथ-साथ क्रिकेट और रंग-बिरंगा होता गया। लेकिन लाल गेंद समय के लंबे सफर में झक सफेद हो गई। इसका कारण बना, डे-नाइट मैच। रात में इसे देखने परेशानी होती थी। सफेद बॉल को काली साइडस्क्रीन के सामने देखने में भी आसानी होती है। जानिए १९८३ से लेकर आज २क्११ तक वनडे क्रिकेट में क्या-क्या बदला..

प्ले टाइम- तब : एक दिवसीय मैच 60 ओवर के होते थे। कपिल देव की टीम फाइनल में 54.4 ओवर में 183 रन बनाकर आउट हुई। जवाब में वेस्टइंडीज १४क् रन ही बना सका।

अब : मैच 50 ओवर का होता है। इसे भी छोटा करने की बात की जा रही है।

पॉवर प्ले- तब : सब कुछ कप्तान की इच्छा पर। कपिल अगर चाहते तो नौ खिलाड़ियों को बाउंड्री पर खड़ा कर सकते थे। और अगर उनकी इ%छा होती कि सभी खिलाड़ी बल्लेबाज के पास खड़े होंगे, तो ऐसा ही होता।

अब : धोनी अब ऐसा नहीं कर सकते। वह पहले 10 ओवर में 30 यार्ड के बाहर सिर्फ 2 खिलाड़ी खड़े कर सकते हैं। इसी दौरान 15 यार्ड के अंदर दो खिलाड़ी मौजूद रह सकते हैं। इसके अलावा फील्डिंग और बगेबाजी करने वाली टीम के कप्तान पांच-पांच ओवर का एक पॉवर प्ले ले सकते हैं।

बाउंसर- तब : बल्लेबाज बाउंसर झेलने के लिए तैयार रहते थे। गेंदबाज तब तक बाउंसर फेंक सकता था, जब तक अंपायर को लगे कि वह ज्यादा ऊंची नहीं है।

अब : एक ओवर में एक ही बाउंसर फेंकने की अनुमति है। दूसरी बाउंसर फेंकने पर उसे नोबॉल करार दे दिया जाता है।

फ्री हिट- तब : गेंदबाज का पैर अगर लाइन से बाहर जाता था, तो एक रन और बॉल मिलती थी।

अब : अतिरिक्त रन तो मिलता ही है। अगली बॉल पर बल्लेबाज कैसे भी खेले आउट नहीं होगा। सिर्फ रनआउट की स्थिति में ही वह आउट होगा।

गेंद- तब : लाल गेंद का इस्तेमाल होता था। पूरी पारी एक ही गेंद से खेली जाती थी। बदला केवल तभी जाता था जब गेंद पूरी तरह से अपना आकार खो दे। हालांकि ऐसा अंपायर को भी लगना चाहिए।

अब : सफेद गेंद लाल की अपेक्षा जल्दी अपना रंग खोती है। इसके बाद इसे पकड़ने में खिलाड़ी को परेशानी होती है। इसलिए हर पारी के 35वें ओवर में गेंद बदल दी जाती है।

अधिकारी- तब : मैदान में सिर्फ दो अंपायर होते थे।

अब : दो मैदानी अंपायर के अलावा टीवी अंपायर भी होता है। यही नहीं बॉल बदलने के लिए चौथा अंपायर और पूरे मैच पर निगरानी के लिए मैच रैफरी भी होता है। इसके अलावा आईसीसी की ड्रग कंट्रोल विंग के अधिकारी और भ्रष्टाचार निरोधी टीम के सदस्य भी होते हैं।

तकनीक- तब : विदेश से सीधा प्रसारण भारत के प्रसारण क्षेत्र में बड़ी बात थी।

अब : मैदान में 30 कैमरा लगे होते हैं। अलीम डार और साइमन टफेल को अगर किसी भी तरह का संदेह हुआ तो उन्होंने वायरलैस के द्वारा इयान गाउल्ड से बात कर इसे दूर किया।

Wednesday, 30 March 2011

कांग्रेस से ज्यादा घिनौनी पार्टी कोई और है?

कांग्रेस से ज्यादा घिनौनी पार्टी कोई और है?

Double Standards of Congress
जरा इनके बयानों का विरोधाभास देखिये....
...

हजारों सिखों का कत्लेआम – एक गलती
कश्मीर में हिन्दुओं का नरसंहार – एक राजनैतिक समस्या
----
गुजरात में कुछ हजार लोगों द्वारा मुसलमानों की हत्या – एक विध्वंस
बंगाल में गरीब प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी – गलतफ़हमी
==
गुजरात में “परजानिया” पर प्रतिबन्ध – साम्प्रदायिक
“दा विंची कोड” और “जो बोले सो निहाल” पर प्रतिबन्ध – धर्मनिरपेक्षता
==
कारगिल हमला – भाजपा सरकार की भूल
चीन का 1962 का हमला – नेहरू को एक धोखा
==
जातिगत आधार पर स्कूल-कालेजों में आरक्षण – सेक्यूलर
अल्पसंख्यक संस्थाओं में भी आरक्षण की भाजपा की मांग – साम्प्रदायिक
=
सोहराबुद्दीन की फ़र्जी मुठभेड़ – भाजपा का सांप्रदायिक चेहरा
ख्वाजा यूनुस का महाराष्ट्र में फ़र्जी मुठभेड़ – पुलिसिया अत्याचार
=
गोधरा के बाद के गुजरात दंगे - मोदी का शर्मनाक कांड
मेरठ, मलियाना, मुम्बई, मालेगाँव आदि-आदि-आदि दंगे - एक प्रशासनिक विफ़लता
=
हिन्दुओं और हिन्दुत्व के बारे बातें करना – सांप्रदायिक
इस्लाम और मुसलमानों के बारे में बातें करना – सेक्यूलर
=
संसद पर हमला – भाजपा सरकार की कमजोरी
अफ़जल गुरु को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद फ़ाँसी न देना – मानवीयता
=
भाजपा के इस्लाम के बारे में सवाल – सांप्रदायिकता
कांग्रेस के “राम” के बारे में सवाल – नौकरशाही की गलती
=
यदि कांग्रेस लोकसभा चुनाव जीती – सोनिया को जनता ने स्वीकारा
मोदी गुजरात में चुनाव जीते – फ़ासिस्टों की जीत
=
सोनिया मोदी को कहती हैं “मौत का सौदागर” – सेक्यूलरिज्म को बढ़ावा
जब मोदी अफ़जल गुरु के बारे में बोले – मुस्लिम विरोधी...............