यह है इंद्रप्रस्थ का इंद्रजाल इसमें भूखी-नंगी जनता सुनहरे सपने देखती है और महारानी के दर्शन भर से धन्य हो जाती है । ग़रीब जनता गौर से निहारती है महारानी को उनमें उसे सत्यहरिश्चंद्र की आत्मा नज़र आती है उसे लगता है वे महारानी नहीं, सत्य हरिश्चंद्र की नया अवतार हैं इंद्रप्रस्थ की रानी कहती है देश में भ्रष्टाचार बढ़ गया करोड़पतियों की संख्या तो बढ़ी ग़रीबों की आबादी में भी इजाफ़ा हुआ रानी कहती है ग़रीबी और भ्रष्टाचार बेहद चिंता की बात जनता जवाब नहीं माँगती वह तो मंत्रमुग्ध है उनके सम्मोहन में ऋषियों का यह देश चाणक्य का भी है चंद्रगुप्त का भी सपने तो टूट ही रहे हैं जिस दिन टूटेगा इंद्रजाल जनता पूछेगी रानी जी! फिर कलमाड़ी को क्यों बचाया ? और राजा को क्यों हटाया? महारानी जी! थरूर पर हुई थू-थू फिर भी कम नही हुई मनमोहन की मुस्कान ये सब के सब तो आप के ही प्यादे हैं न राज आपका बिसात आपकी प्यादे आपके संविधान में सरकार भले ही चलती है संसद से हक़ीक़त यह है कि दस जनपथ की इच्छा के बिना सात रेस कोर्स का पत्ता तक नहीं हिलता रानी जी, पूरा देश जानता है आपकी मुस्कान से ही मुस्कुराते हैं करोड़पति-अरबपति आपके चहकने से आमजन हो जाता है मायूस दरअसल सिर्फ़ कहने को जनपथ में रहती हैं आप भले ही इस देश में आपका अपना कोई घर-बार नहीं हक़ीक़त में आप राजपथ की रानी हैं तौर-तरीके और रहन-सहन से तो यही लगता है आप इंद्रप्रस्थ की महारानी हैं । समय आने दीजिए महारानी जी! भूखी-नंगी जनता करेगी आपकी करतूतों का पूरा हिसाब पूछेगी क्या हुआ अफ़ज़ल का, कहाँ है कसाब ? पूछेगी क्या संसद से भी बड़ा है होटल ताज ? महारानी जी यही है आपका राज ? ज़रूर टूटेगा एक दिन इंद्रजाल और भूखी-नंगी जनता को लगेगा आपमें नहीं बसती है सत्य हरिश्चंद्र की आत्मा ।
Tuesday, 31 May 2011
इंद्रप्रस्थ
कबीर दोहावली
दुख में सुमरिन सब करे, सुख मे करे न कोय ।
जो सुख मे सुमरिन करे, दुख काहे को होय ॥ 1 ॥
तिनका कबहुँ न निंदिये, जो पाँयन तर होय ।
कबहुँ उड़ आँखिन परे, पीर घनेरी होय ॥ 2 ॥
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार दें, मन का मनका फेर ॥ 3 ॥
गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय ॥ 4 ॥
बलिहारी गुरु आपनो, घड़ी-घड़ी सौ सौ बार ।
मानुष से देवत किया करत न लागी बार ॥ 5 ॥
कबिरा माला मनहि की, और संसारी भीख ।
माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख ॥ 6 ॥
सुख मे सुमिरन ना किया, दु:ख में किया याद ।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥ 7 ॥
साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥ 8 ॥
लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट ।
पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥ 9 ॥
जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान ।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ॥ 10 ॥
जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप ।
जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप ॥ 11 ॥
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥ 12 ॥
कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥ 13 ॥
पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय ।
एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय ॥ 14 ॥
कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान ।
जम जब घर ले जायेंगे, पड़ी रहेगी म्यान ॥ 15 ॥
शीलवन्त सबसे बड़ा, सब रतनन की खान ।
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ॥ 16 ॥
माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥ 17 ॥
माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय ॥ 18 ॥
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीना जन्म अनमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥ 19 ॥
नींद निशानी मौत की, उठ कबीरा जाग ।
और रसायन छांड़ि के, नाम रसायन लाग ॥ 20 ॥
जो तोकु कांटा बुवे, ताहि बोय तू फूल ।
तोकू फूल के फूल है, बाकू है त्रिशूल ॥ 21 ॥
दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार ।
तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे डार ॥ 22 ॥
आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर ।
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बँधे जात जंजीर ॥ 23 ॥
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब ॥ 24 ॥
माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख ।
माँगन से तो मरना भला, यह सतगुरु की सीख ॥ 25 ॥
जहाँ आपा तहाँ आपदां, जहाँ संशय तहाँ रोग ।
कह कबीर यह क्यों मिटे, चारों धीरज रोग ॥ 26 ॥
माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय ।
भगता के पीछे लगे, सम्मुख भागे सोय ॥ 27 ॥
आया था किस काम को, तु सोया चादर तान ।
सुरत सम्भाल ए गाफिल, अपना आप पहचान ॥ 28 ॥
क्या भरोसा देह का, बिनस जात छिन मांह ।
साँस-सांस सुमिरन करो और यतन कुछ नांह ॥ 29 ॥
गारी ही सों ऊपजे, कलह कष्ट और मींच ।
हारि चले सो साधु है, लागि चले सो नींच ॥ 30 ॥
दुर्बल को न सताइए, जाकि मोटी हाय ।
बिना जीव की हाय से, लोहा भस्म हो जाय ॥ 31 ॥
दान दिए धन ना घते, नदी ने घटे नीर ।
अपनी आँखों देख लो, यों क्या कहे कबीर ॥ 32 ॥
दस द्वारे का पिंजरा, तामे पंछी का कौन ।
रहे को अचरज है, गए अचम्भा कौन ॥ 33 ॥
ऐसी वाणी बोलेए, मन का आपा खोय ।
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय ॥ 34 ॥
हीरा वहाँ न खोलिये, जहाँ कुंजड़ों की हाट ।
बांधो चुप की पोटरी, लागहु अपनी बाट ॥ 35 ॥
कुटिल वचन सबसे बुरा, जारि कर तन हार ।
साधु वचन जल रूप, बरसे अमृत धार ॥ 36 ॥
जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय ।
यह आपा तो ड़ाल दे, दया करे सब कोय ॥ 37 ॥
मैं रोऊँ जब जगत को, मोको रोवे न होय ।
मोको रोबे सोचना, जो शब्द बोय की होय ॥ 38 ॥
सोवा साधु जगाइए, करे नाम का जाप ।
यह तीनों सोते भले, साकित सिंह और साँप ॥ 39 ॥
अवगुन कहूँ शराब का, आपा अहमक साथ ।
मानुष से पशुआ करे दाय, गाँठ से खात ॥ 40 ॥
बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन के साथ ।
नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ ॥ 41 ॥
अटकी भाल शरीर में तीर रहा है टूट ।
चुम्बक बिना निकले नहीं कोटि पटन को फ़ूट ॥ 42 ॥
कबीरा जपना काठ की, क्या दिख्लावे मोय ।
ह्रदय नाम न जपेगा, यह जपनी क्या होय ॥ 43 ॥
पतिवृता मैली, काली कुचल कुरूप ।
पतिवृता के रूप पर, वारो कोटि सरूप ॥ 44 ॥
बैध मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार ।
एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार ॥ 45 ॥
हर चाले तो मानव, बेहद चले सो साध ।
हद बेहद दोनों तजे, ताको भता अगाध ॥ 46 ॥
राम रहे बन भीतरे गुरु की पूजा ना आस ।
रहे कबीर पाखण्ड सब, झूठे सदा निराश ॥ 47 ॥
जाके जिव्या बन्धन नहीं, ह्र्दय में नहीं साँच ।
वाके संग न लागिये, खाले वटिया काँच ॥ 48 ॥
तीरथ गये ते एक फल, सन्त मिले फल चार ।
सत्गुरु मिले अनेक फल, कहें कबीर विचार ॥ 49 ॥
सुमरण से मन लाइए, जैसे पानी बिन मीन ।
प्राण तजे बिन बिछड़े, सन्त कबीर कह दीन ॥ 50 ॥
समझाये समझे नहीं, पर के साथ बिकाय ।
मैं खींचत हूँ आपके, तू चला जमपुर जाए ॥ 51 ॥
हंसा मोती विण्न्या, कुञ्च्न थार भराय ।
जो जन मार्ग न जाने, सो तिस कहा कराय ॥ 52 ॥
कहना सो कह दिया, अब कुछ कहा न जाय ।
एक रहा दूजा गया, दरिया लहर समाय ॥ 53 ॥
वस्तु है ग्राहक नहीं, वस्तु सागर अनमोल ।
बिना करम का मानव, फिरैं डांवाडोल ॥ 54 ॥
कली खोटा जग आंधरा, शब्द न माने कोय ।
चाहे कहँ सत आइना, जो जग बैरी होय ॥ 55 ॥
कामी, क्रोधी, लालची, इनसे भक्ति न होय ।
भक्ति करे कोइ सूरमा, जाति वरन कुल खोय ॥ 56 ॥
जागन में सोवन करे, साधन में लौ लाय ।
सूरत डोर लागी रहे, तार टूट नाहिं जाय ॥ 57 ॥
साधु ऐसा चहिए ,जैसा सूप सुभाय ।
सार-सार को गहि रहे, थोथ देइ उड़ाय ॥ 58 ॥
लगी लग्न छूटे नाहिं, जीभ चोंच जरि जाय ।
मीठा कहा अंगार में, जाहि चकोर चबाय ॥ 59 ॥
भक्ति गेंद चौगान की, भावे कोई ले जाय ।
कह कबीर कुछ भेद नाहिं, कहां रंक कहां राय ॥ 60 ॥
घट का परदा खोलकर, सन्मुख दे दीदार ।
बाल सनेही सांइयाँ, आवा अन्त का यार ॥ 61 ॥
अन्तर्यामी एक तुम, आत्मा के आधार ।
जो तुम छोड़ो हाथ तो, कौन उतारे पार ॥ 62 ॥
मैं अपराधी जन्म का, नख-सिख भरा विकार ।
तुम दाता दु:ख भंजना, मेरी करो सम्हार ॥ 63 ॥
प्रेम न बड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय ।
राजा-प्रजा जोहि रुचें, शीश देई ले जाय ॥ 64 ॥
प्रेम प्याला जो पिये, शीश दक्षिणा देय ।
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय ॥ 65 ॥
सुमिरन में मन लाइए, जैसे नाद कुरंग ।
कहैं कबीर बिसरे नहीं, प्रान तजे तेहि संग ॥ 66 ॥
सुमरित सुरत जगाय कर, मुख के कछु न बोल ।
बाहर का पट बन्द कर, अन्दर का पट खोल ॥ 67 ॥
छीर रूप सतनाम है, नीर रूप व्यवहार ।
हंस रूप कोई साधु है, सत का छाननहार ॥ 68 ॥
जो सुख मे सुमरिन करे, दुख काहे को होय ॥ 1 ॥
तिनका कबहुँ न निंदिये, जो पाँयन तर होय ।
कबहुँ उड़ आँखिन परे, पीर घनेरी होय ॥ 2 ॥
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार दें, मन का मनका फेर ॥ 3 ॥
गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय ॥ 4 ॥
बलिहारी गुरु आपनो, घड़ी-घड़ी सौ सौ बार ।
मानुष से देवत किया करत न लागी बार ॥ 5 ॥
कबिरा माला मनहि की, और संसारी भीख ।
माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख ॥ 6 ॥
सुख मे सुमिरन ना किया, दु:ख में किया याद ।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥ 7 ॥
साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥ 8 ॥
लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट ।
पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥ 9 ॥
जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान ।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ॥ 10 ॥
जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप ।
जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप ॥ 11 ॥
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥ 12 ॥
कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥ 13 ॥
पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय ।
एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय ॥ 14 ॥
कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान ।
जम जब घर ले जायेंगे, पड़ी रहेगी म्यान ॥ 15 ॥
शीलवन्त सबसे बड़ा, सब रतनन की खान ।
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ॥ 16 ॥
माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥ 17 ॥
माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय ॥ 18 ॥
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीना जन्म अनमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥ 19 ॥
नींद निशानी मौत की, उठ कबीरा जाग ।
और रसायन छांड़ि के, नाम रसायन लाग ॥ 20 ॥
जो तोकु कांटा बुवे, ताहि बोय तू फूल ।
तोकू फूल के फूल है, बाकू है त्रिशूल ॥ 21 ॥
दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार ।
तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे डार ॥ 22 ॥
आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर ।
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बँधे जात जंजीर ॥ 23 ॥
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब ॥ 24 ॥
माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख ।
माँगन से तो मरना भला, यह सतगुरु की सीख ॥ 25 ॥
जहाँ आपा तहाँ आपदां, जहाँ संशय तहाँ रोग ।
कह कबीर यह क्यों मिटे, चारों धीरज रोग ॥ 26 ॥
माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय ।
भगता के पीछे लगे, सम्मुख भागे सोय ॥ 27 ॥
आया था किस काम को, तु सोया चादर तान ।
सुरत सम्भाल ए गाफिल, अपना आप पहचान ॥ 28 ॥
क्या भरोसा देह का, बिनस जात छिन मांह ।
साँस-सांस सुमिरन करो और यतन कुछ नांह ॥ 29 ॥
गारी ही सों ऊपजे, कलह कष्ट और मींच ।
हारि चले सो साधु है, लागि चले सो नींच ॥ 30 ॥
दुर्बल को न सताइए, जाकि मोटी हाय ।
बिना जीव की हाय से, लोहा भस्म हो जाय ॥ 31 ॥
दान दिए धन ना घते, नदी ने घटे नीर ।
अपनी आँखों देख लो, यों क्या कहे कबीर ॥ 32 ॥
दस द्वारे का पिंजरा, तामे पंछी का कौन ।
रहे को अचरज है, गए अचम्भा कौन ॥ 33 ॥
ऐसी वाणी बोलेए, मन का आपा खोय ।
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय ॥ 34 ॥
हीरा वहाँ न खोलिये, जहाँ कुंजड़ों की हाट ।
बांधो चुप की पोटरी, लागहु अपनी बाट ॥ 35 ॥
कुटिल वचन सबसे बुरा, जारि कर तन हार ।
साधु वचन जल रूप, बरसे अमृत धार ॥ 36 ॥
जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय ।
यह आपा तो ड़ाल दे, दया करे सब कोय ॥ 37 ॥
मैं रोऊँ जब जगत को, मोको रोवे न होय ।
मोको रोबे सोचना, जो शब्द बोय की होय ॥ 38 ॥
सोवा साधु जगाइए, करे नाम का जाप ।
यह तीनों सोते भले, साकित सिंह और साँप ॥ 39 ॥
अवगुन कहूँ शराब का, आपा अहमक साथ ।
मानुष से पशुआ करे दाय, गाँठ से खात ॥ 40 ॥
बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन के साथ ।
नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ ॥ 41 ॥
अटकी भाल शरीर में तीर रहा है टूट ।
चुम्बक बिना निकले नहीं कोटि पटन को फ़ूट ॥ 42 ॥
कबीरा जपना काठ की, क्या दिख्लावे मोय ।
ह्रदय नाम न जपेगा, यह जपनी क्या होय ॥ 43 ॥
पतिवृता मैली, काली कुचल कुरूप ।
पतिवृता के रूप पर, वारो कोटि सरूप ॥ 44 ॥
बैध मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार ।
एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार ॥ 45 ॥
हर चाले तो मानव, बेहद चले सो साध ।
हद बेहद दोनों तजे, ताको भता अगाध ॥ 46 ॥
राम रहे बन भीतरे गुरु की पूजा ना आस ।
रहे कबीर पाखण्ड सब, झूठे सदा निराश ॥ 47 ॥
जाके जिव्या बन्धन नहीं, ह्र्दय में नहीं साँच ।
वाके संग न लागिये, खाले वटिया काँच ॥ 48 ॥
तीरथ गये ते एक फल, सन्त मिले फल चार ।
सत्गुरु मिले अनेक फल, कहें कबीर विचार ॥ 49 ॥
सुमरण से मन लाइए, जैसे पानी बिन मीन ।
प्राण तजे बिन बिछड़े, सन्त कबीर कह दीन ॥ 50 ॥
समझाये समझे नहीं, पर के साथ बिकाय ।
मैं खींचत हूँ आपके, तू चला जमपुर जाए ॥ 51 ॥
हंसा मोती विण्न्या, कुञ्च्न थार भराय ।
जो जन मार्ग न जाने, सो तिस कहा कराय ॥ 52 ॥
कहना सो कह दिया, अब कुछ कहा न जाय ।
एक रहा दूजा गया, दरिया लहर समाय ॥ 53 ॥
वस्तु है ग्राहक नहीं, वस्तु सागर अनमोल ।
बिना करम का मानव, फिरैं डांवाडोल ॥ 54 ॥
कली खोटा जग आंधरा, शब्द न माने कोय ।
चाहे कहँ सत आइना, जो जग बैरी होय ॥ 55 ॥
कामी, क्रोधी, लालची, इनसे भक्ति न होय ।
भक्ति करे कोइ सूरमा, जाति वरन कुल खोय ॥ 56 ॥
जागन में सोवन करे, साधन में लौ लाय ।
सूरत डोर लागी रहे, तार टूट नाहिं जाय ॥ 57 ॥
साधु ऐसा चहिए ,जैसा सूप सुभाय ।
सार-सार को गहि रहे, थोथ देइ उड़ाय ॥ 58 ॥
लगी लग्न छूटे नाहिं, जीभ चोंच जरि जाय ।
मीठा कहा अंगार में, जाहि चकोर चबाय ॥ 59 ॥
भक्ति गेंद चौगान की, भावे कोई ले जाय ।
कह कबीर कुछ भेद नाहिं, कहां रंक कहां राय ॥ 60 ॥
घट का परदा खोलकर, सन्मुख दे दीदार ।
बाल सनेही सांइयाँ, आवा अन्त का यार ॥ 61 ॥
अन्तर्यामी एक तुम, आत्मा के आधार ।
जो तुम छोड़ो हाथ तो, कौन उतारे पार ॥ 62 ॥
मैं अपराधी जन्म का, नख-सिख भरा विकार ।
तुम दाता दु:ख भंजना, मेरी करो सम्हार ॥ 63 ॥
प्रेम न बड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय ।
राजा-प्रजा जोहि रुचें, शीश देई ले जाय ॥ 64 ॥
प्रेम प्याला जो पिये, शीश दक्षिणा देय ।
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय ॥ 65 ॥
सुमिरन में मन लाइए, जैसे नाद कुरंग ।
कहैं कबीर बिसरे नहीं, प्रान तजे तेहि संग ॥ 66 ॥
सुमरित सुरत जगाय कर, मुख के कछु न बोल ।
बाहर का पट बन्द कर, अन्दर का पट खोल ॥ 67 ॥
छीर रूप सतनाम है, नीर रूप व्यवहार ।
हंस रूप कोई साधु है, सत का छाननहार ॥ 68 ॥
हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला ! / 'मनुज' देपावत
हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में ।
था एक दिवस जब तेरे इस आँगन में फूली अमराई !
था एक दिवस जब मेरे भी मन में झूमी थी तरुणाई !
पीपल की फुनगी पर बोली, पंचम स्वर में कोयल काली !
मादक मधु-ऋतु के स्वागत में, कोसों तक फैली हरियाली !
पावस की मतवाली संध्या, आती अम्बर से उतर-उतर !
उन खेतों की पगडंडी पर, वह बैलों की घंटी का स्वर !
फिर तीजों का त्यौहार सुखद, सखियों के मादक गीत मधुर !
झूलों के मस्त झकोरों पर, जाते उर के अरमान बिखर !
तुम इन्द्रपुरी से सुन्दर थे मेरे मरुधर के सुखद ग्राम !
तेरे रेतीले धोरों पर उल्लास बिछाती सुबह शाम !
किस्मत की मिटी लकीरों से, रे, आज कहाँ वे दिन बीते!
जगती के विष की तुलना में, ये जीवन के मधुघट रीते !
अरमान सुलगते शोलों से , मानव मन के अवसादों में ! हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में ।
क्या तुझे सुनाऊँ आज सखे ! ये पीड़ा के पहचाने हैं !
ये दग्ध-ह्रदय के छले हैं, ये दर्द भरे अफ़साने हैं !
यह ज़ुल्म ज़मीदारों का है, यह धनिकों की मनमानी है !
बेकस किसान के जीवन की, यह जलती हुई कहानी है !
क्या कभी सुना भी है तुमने ! मानव मानव को खाता है !
पीकर लोहू चटकार जीभ, फिर हँसकर दाँत दिखाता है !
ये ज़मींदार कहलाते हैं, मूँछों पर ताव लगाते हैं !
सौ-सौ को साथ डकार जाएँ, पर कभी डकार ना खाते हैं !
पर इनको कौन कहे ज़ालिम, ये शोषक सत्ताधारी हैं !
इनकी उस ईश्वर के स्वरूप राजा से रिश्तेदारी है !
इनकी वह लाल हवेली है, अम्बर में ऊँचा शीश किए !
इन कंगालों की कुटिया का जो आँखों में उपहास लिए !
वह रात मनाती रंगरलियाँ, मधु-प्यालों के आह्लादों में ! हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में ।
कर्मठ किसान के खेतों पर, आतंक ध्वजा फहराती है !
इनके वे टैक्स-लगान देख कर मानवता थर्राती है !
"भूंगे" का भूत लगा सिर पर, आँखों में क्रूर विनाश लिए !
बेदख़ली के बादल छाए, बस महाप्रलय का श्वास लिए !
बेगार प्रथा की बाँहों में जीवन की साध सिसकती है !
नंगे-भूखों की आँहों में आँखों की आग बरसती है !
ये जान सकेंगे कभी नहीं, इस जगती का वैभव क्या है !
कोई इनसे जाकर पूछे, दो पैरों का मानव क्या है ?
मानव मिट्टी का रोड़ा है, बस, जब चाहा तब तोड़ दिया !
मानव टम-टम का घोड़ा है, बस, जब चाहा तब जोड़ दिया !
वह नाबदान का कीड़ा है, किलबिल करता है सुबह-शाम !
वह पूँछ हिलाता कुत्ता है, अपने मालिक का चिर-ग़ुलाम !
वह अपनी हस्ती बेच चुका, अपने मालिक के हाथों में ! हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में ।
पर कौन यहाँ सुनने वाला, वे तो मस्ती में गाते हैं !
कंगाल खड़े हैं यहाँ इधर, पर वे मधु-रात मनाते हैं !
वे उस दूकान पर जाते हैं, जिस पर यौवन बिकता रहता !
पैसे-पैसे के बदले में जो मिट्टी में मिलता रहता !
उनके वे काग़ज़ के टुकड़े, उस ज्वाला में जल जाते हैं !
बरसों से मिले हुए मोती, उस पानी में घुल जाते हैं !
उद्दाम वासना का यौवन, उस धारा में बह जाता है !
नारी का नंगा तन झकोर, वह काँप-काँप रह जाता है !
फिर भी वे अपनी सत्ता का, कुछ सार जमाने वाले हैं !
कंगलों के झूठे टुकड़ों पर, अधिकार जमाने वाले हैं !
यह मानव की दुनिया कठोर, यह मानव का संसार विषम !
दुर्बल के निर्बल कन्धों पर, दुस्साह जीवन का भार विषम !
वह राग बेबसी का उठता, महफ़िल के मधुर निनादों में ! हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में ।
था एक दिवस जब तेरे इस आँगन में फूली अमराई !
था एक दिवस जब मेरे भी मन में झूमी थी तरुणाई !
पीपल की फुनगी पर बोली, पंचम स्वर में कोयल काली !
मादक मधु-ऋतु के स्वागत में, कोसों तक फैली हरियाली !
पावस की मतवाली संध्या, आती अम्बर से उतर-उतर !
उन खेतों की पगडंडी पर, वह बैलों की घंटी का स्वर !
फिर तीजों का त्यौहार सुखद, सखियों के मादक गीत मधुर !
झूलों के मस्त झकोरों पर, जाते उर के अरमान बिखर !
तुम इन्द्रपुरी से सुन्दर थे मेरे मरुधर के सुखद ग्राम !
तेरे रेतीले धोरों पर उल्लास बिछाती सुबह शाम !
किस्मत की मिटी लकीरों से, रे, आज कहाँ वे दिन बीते!
जगती के विष की तुलना में, ये जीवन के मधुघट रीते !
अरमान सुलगते शोलों से , मानव मन के अवसादों में ! हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में ।
क्या तुझे सुनाऊँ आज सखे ! ये पीड़ा के पहचाने हैं !
ये दग्ध-ह्रदय के छले हैं, ये दर्द भरे अफ़साने हैं !
यह ज़ुल्म ज़मीदारों का है, यह धनिकों की मनमानी है !
बेकस किसान के जीवन की, यह जलती हुई कहानी है !
क्या कभी सुना भी है तुमने ! मानव मानव को खाता है !
पीकर लोहू चटकार जीभ, फिर हँसकर दाँत दिखाता है !
ये ज़मींदार कहलाते हैं, मूँछों पर ताव लगाते हैं !
सौ-सौ को साथ डकार जाएँ, पर कभी डकार ना खाते हैं !
पर इनको कौन कहे ज़ालिम, ये शोषक सत्ताधारी हैं !
इनकी उस ईश्वर के स्वरूप राजा से रिश्तेदारी है !
इनकी वह लाल हवेली है, अम्बर में ऊँचा शीश किए !
इन कंगालों की कुटिया का जो आँखों में उपहास लिए !
वह रात मनाती रंगरलियाँ, मधु-प्यालों के आह्लादों में ! हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में ।
कर्मठ किसान के खेतों पर, आतंक ध्वजा फहराती है !
इनके वे टैक्स-लगान देख कर मानवता थर्राती है !
"भूंगे" का भूत लगा सिर पर, आँखों में क्रूर विनाश लिए !
बेदख़ली के बादल छाए, बस महाप्रलय का श्वास लिए !
बेगार प्रथा की बाँहों में जीवन की साध सिसकती है !
नंगे-भूखों की आँहों में आँखों की आग बरसती है !
ये जान सकेंगे कभी नहीं, इस जगती का वैभव क्या है !
कोई इनसे जाकर पूछे, दो पैरों का मानव क्या है ?
मानव मिट्टी का रोड़ा है, बस, जब चाहा तब तोड़ दिया !
मानव टम-टम का घोड़ा है, बस, जब चाहा तब जोड़ दिया !
वह नाबदान का कीड़ा है, किलबिल करता है सुबह-शाम !
वह पूँछ हिलाता कुत्ता है, अपने मालिक का चिर-ग़ुलाम !
वह अपनी हस्ती बेच चुका, अपने मालिक के हाथों में ! हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में ।
पर कौन यहाँ सुनने वाला, वे तो मस्ती में गाते हैं !
कंगाल खड़े हैं यहाँ इधर, पर वे मधु-रात मनाते हैं !
वे उस दूकान पर जाते हैं, जिस पर यौवन बिकता रहता !
पैसे-पैसे के बदले में जो मिट्टी में मिलता रहता !
उनके वे काग़ज़ के टुकड़े, उस ज्वाला में जल जाते हैं !
बरसों से मिले हुए मोती, उस पानी में घुल जाते हैं !
उद्दाम वासना का यौवन, उस धारा में बह जाता है !
नारी का नंगा तन झकोर, वह काँप-काँप रह जाता है !
फिर भी वे अपनी सत्ता का, कुछ सार जमाने वाले हैं !
कंगलों के झूठे टुकड़ों पर, अधिकार जमाने वाले हैं !
यह मानव की दुनिया कठोर, यह मानव का संसार विषम !
दुर्बल के निर्बल कन्धों पर, दुस्साह जीवन का भार विषम !
वह राग बेबसी का उठता, महफ़िल के मधुर निनादों में ! हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में ।
मेरी पहचान रहेगी मेरे अफसानों में / श्रद्धा जैन
जैसे होती थी किसी दौर में, हैवानों में
बेसकूनी है वही आज के इंसानों में
जल्द उकताते हैं हर चीज़ से, हर मंजिल से
ये परिंदों की सी आदत भी है दीवानों में
उम्र भर सच के सिवा कुछ न कहेंगे, कह कर
नाम लिखवा लिया अब हमने भी नादानों में
जिस्म दुनिया में भी जन्नत के मज़े लेता रहा
रूह इक उम्र भटकती रही वीरानों में
उसकी मेहमान नवाजी की अदाएं देखीं
हम भी सकुचाए से बैठे रहे बेगानों में
नाम, सूरत तो हैं पानी पे लिखी तहरीरें
मेरी पहचान रहेगी मेरे अफसानों में
झूठ का ज़हर समाअत से उतर जाएगा
बूंद सच्चाई की उतरे तो मेरे कानों में
जो भी होना है वो निश्चित है, अटल है ‘श्रद्धा’
क्यूँ न कश्ती को उतारे कभी तूफानों में
बेसकूनी है वही आज के इंसानों में
जल्द उकताते हैं हर चीज़ से, हर मंजिल से
ये परिंदों की सी आदत भी है दीवानों में
उम्र भर सच के सिवा कुछ न कहेंगे, कह कर
नाम लिखवा लिया अब हमने भी नादानों में
जिस्म दुनिया में भी जन्नत के मज़े लेता रहा
रूह इक उम्र भटकती रही वीरानों में
उसकी मेहमान नवाजी की अदाएं देखीं
हम भी सकुचाए से बैठे रहे बेगानों में
नाम, सूरत तो हैं पानी पे लिखी तहरीरें
मेरी पहचान रहेगी मेरे अफसानों में
झूठ का ज़हर समाअत से उतर जाएगा
बूंद सच्चाई की उतरे तो मेरे कानों में
जो भी होना है वो निश्चित है, अटल है ‘श्रद्धा’
क्यूँ न कश्ती को उतारे कभी तूफानों में
सीमावर्ती क्षेत्र में पानी का बंटवारा
राजस्थान में बाड़मेर जिले के सीमावर्ती खबड़ाला गांव की सरकारी पानी की हौदी में महीने में तीन बार ही पानी आता है। इस से जुड़े दस गांवों के लोगों ने आपस में कलह को रोकने के लिए पानी का ही बंटवारा कर दिया है। लिहाजा अब महीने में तीन दिन आने वाले पानी में बारी-बारी से चार-चार गांव पानी ले रहे है । शेष 29 दिन पानी के लिए ग्रामीण मीलों सफर कर रहे हैं।
भारत पाकिस्तान की सरहद पर बसें बाड़मेर जिले के सबसे दुर्गम ग्राम पंचायत खबडाला में गत दो सालों से पानी की भारी किल्लत झेलनें के बाद गांव में पानी को लेकर खिंचने वाली तलवारों पर लगाम कसकर ग्रामीणों ने आपसी सहमती बना कर प्रत्येक गांव में पानी का बंटवारा कर दिया है खबडाला के बुजर्ग रतन सिंह सोढा के अनुसार विगत तीन सालों से खबडाला ग्राम पंचायत सहित बचिया,पूंजराज का पार,सगरानी,पिपरली,द्राभा,गारी,मणिहारी सहित 94 गांवों में पेयजल की जबरदस्त किल्लत के चलतें ग्रामीणें के सामने बडी समस्या खडी हो गई। पुराने होदी में महीने में तीन चार दिन पानी आता है आपूर्ति के समय आसपास के गांवों के ग्रामीण भी पानी भरने आते हैं इतना कम पानी हमारे एक गांव की भी प्यास नहीं बुझा पाता ऐसे में दूसरे गांवों के लोगों को कैसे पानी भरने दे।इसी बात को लेकर गांवों के बीच झगडे भी होने लगे।कई बार तलवारें भी ।रोज रोज की पेशानी सें निपटने के लिऐं ग्रामीणों नें सर्व सम्मति से ग्राम पंचायत के दस गावो की समझौता बैठक बुला कर पानी का बंअवारा करने का निर्णय लिया गया। यह पानी उठों के माध्यम से बाटा जा रहा है
भारत पाकिस्तान की सरहद पर बसें बाड़मेर जिले के सबसे दुर्गम ग्राम पंचायत खबडाला में गत दो सालों से पानी की भारी किल्लत झेलनें के बाद गांव में पानी को लेकर खिंचने वाली तलवारों पर लगाम कसकर ग्रामीणों ने आपसी सहमती बना कर प्रत्येक गांव में पानी का बंटवारा कर दिया है खबडाला के बुजर्ग रतन सिंह सोढा के अनुसार विगत तीन सालों से खबडाला ग्राम पंचायत सहित बचिया,पूंजराज का पार,सगरानी,पिपरली,द्राभा,गारी,मणिहारी सहित 94 गांवों में पेयजल की जबरदस्त किल्लत के चलतें ग्रामीणें के सामने बडी समस्या खडी हो गई। पुराने होदी में महीने में तीन चार दिन पानी आता है आपूर्ति के समय आसपास के गांवों के ग्रामीण भी पानी भरने आते हैं इतना कम पानी हमारे एक गांव की भी प्यास नहीं बुझा पाता ऐसे में दूसरे गांवों के लोगों को कैसे पानी भरने दे।इसी बात को लेकर गांवों के बीच झगडे भी होने लगे।कई बार तलवारें भी ।रोज रोज की पेशानी सें निपटने के लिऐं ग्रामीणों नें सर्व सम्मति से ग्राम पंचायत के दस गावो की समझौता बैठक बुला कर पानी का बंअवारा करने का निर्णय लिया गया। यह पानी उठों के माध्यम से बाटा जा रहा है
. रतन सिंह सोढा निवासी ,खबडाला गाव के अनुसार विगत तीन सालों से खबडाला ग्राम पंचायत सहित बचिया,पूंजराज का पार,सगरानी,पिपरली,द्राभा,गारी, मणिहारी सहित 94 गांवों में पेयजल की जबरदस्त किल्लत के चलतें ग्रामीणें के सामने बडी समस्या खडी हो गई। पुराने होदी में महीने में तीन चार दिन पानी आता है आपूर्ति के समय आसपास के गांवों के ग्रामीण भी पानी भरने आते हैं इतना कम पानी हमारे एक गांव की भी प्यास नहीं बुझा पाता ऐसे में दूसरे गांवों के लोगों को कैसे पानी भरने दे।इसी बात को लेकर गांवों के बीच झगडे भी होने लगे।कई बार तलवारें भी ।रोज रोज की पेशानी सें निपटने के लिऐं ग्रामीणों नें सर्व सम्मति से ग्राम पंचायत के दस गावो की समझौता बैठक बुला कर पानी का बंअवारा करने का निर्णय लिया गया। पास के गाव सगरानी के रहने वाले मोकम सिंह के अनुसार पानी को लेकर राज झगडा हो जाता है कुछ दिन पहले है अपनी को लेकर सभी गाव में कलह हो गई फिर हमने पानी के बटवारा कर दिया हमारे यह पानी की भयकर किल्लत है आने वाले दिनों यहाँ पर पानी की कमी के चलते जानवर मर जाएगे
चुकी देवी के अनुसार गाव में पानी के लिए लड़ाई रोज होती है और अब पानी का बटवारा कर दिया है अभी तक हम कई किलोमीटर दूर जाकर पानी लाते है मोकम सिंह निवासी . सगरानी गाव के अनुसार पानी को लेकर राज झगडा हो जाता है कुछ दिन पहले है अपनी को लेकर सभी गाव में कलह हो गई फिर हमने पानी के बटवारा कर दिया हमारे यह पानी की भयकर किल्लत है आने वाले दिनों यहाँ पर पानी की कमी के चलते जानवर मर जाएगे
चुकी देवी ,निवासी ,सगरानी गाव के अनुसार गाव में पानी के लिए लड़ाई रोज होती है और अब पानी का बटवारा कर दिया है अभी तक हम कई किलोमीटर दूर जाकर पानी लाते .
इन गावो में ओरतो के साथ छोटे छोटे बच्चे कई मील दूर चलकर लाते है अब यह हाल है की पानी के सभी साधन सुख गए है लिहाजा अब गाव की ओरते को बिना पानी लिए है लोटना पड़ रहा है सबसे बड़ा सवाल यह है अब यह हाल है तो मई और जून महीने में इन गावो के क्या हाल होगे
चुकी देवी ,निवासी ,सगरानी गाव के अनुसार गाव में पानी के लिए लड़ाई रोज होती है और अब पानी का बटवारा कर दिया है अभी तक हम कई किलोमीटर दूर जाकर पानी लाते .
इन गावो में ओरतो के साथ छोटे छोटे बच्चे कई मील दूर चलकर लाते है अब यह हाल है की पानी के सभी साधन सुख गए है लिहाजा अब गाव की ओरते को बिना पानी लिए है लोटना पड़ रहा है सबसे बड़ा सवाल यह है अब यह हाल है तो मई और जून महीने में इन गावो के क्या हाल होगे
Monday, 30 May 2011
रहस्यमय शब्द !
आज तुम फिर बिसराओगे ,
समझते हुए भी न समझोगे ,
कहीं दूर टकटकी लगाओगे,
विशाल क्षितिज के उस पार,
दृष्टि तुम्हारी भेदती सी ,
अनंत काल के रहस्य को !
किन्तु फिर वही,फिर वही
झंझावातों में फंसकर ,
तुम फिर अनवरत प्रयासरत ,
अपनी स्थितप्रज्ञता के लिए ,
वही गीता या योग वशिष्ठ ,
तुम्हारे झरे स्वप्नों को
थामते-थामते ,
फिर वही सशक्त ,
रहस्यमय शब्द !
क्योंकि रहस्य ही
तो पूर्ण सौंदर्य है !
समझते हुए भी न समझोगे ,
कहीं दूर टकटकी लगाओगे,
विशाल क्षितिज के उस पार,
दृष्टि तुम्हारी भेदती सी ,
अनंत काल के रहस्य को !
किन्तु फिर वही,फिर वही
झंझावातों में फंसकर ,
तुम फिर अनवरत प्रयासरत ,
अपनी स्थितप्रज्ञता के लिए ,
वही गीता या योग वशिष्ठ ,
तुम्हारे झरे स्वप्नों को
थामते-थामते ,
फिर वही सशक्त ,
रहस्यमय शब्द !
क्योंकि रहस्य ही
तो पूर्ण सौंदर्य है !
आदत तो न थी
खाली रास्तों को
निहारना मेरी आदत तो न थी
खाली पनों को
स्याह करना मेरी फितरत तो न थी
खाली चेहरों में
रंग भरना मेरी तमन्ना
तो न थी
खाली शब्दों से
जुबां को जोड़ना मेरी हसरत तो न थी
खाली नज़रों से
ख्वाबो को बुनना मेरी आरज़ू तो न थी
खाली पलकों से
आंसू में मुस्कुराना मेरी अदा तो न थी
खाली रास्तों से
खाली पनों से
खाली चेहरों से
खाली शब्दों से
खाली नज़रों तक
जब न थी कोई
आदत न फितरत
न तमन्ना न हसरत
न आरज़ू न अदा ,
फिर है ये जाल कौन सा
तकदीर का
जिस में उलझता ही
जाता है जीवन
हर साँझ थोडा
हर रात थोडा
निहारना मेरी आदत तो न थी
खाली पनों को
स्याह करना मेरी फितरत तो न थी
खाली चेहरों में
रंग भरना मेरी तमन्ना
तो न थी
खाली शब्दों से
जुबां को जोड़ना मेरी हसरत तो न थी
खाली नज़रों से
ख्वाबो को बुनना मेरी आरज़ू तो न थी
खाली पलकों से
आंसू में मुस्कुराना मेरी अदा तो न थी
खाली रास्तों से
खाली पनों से
खाली चेहरों से
खाली शब्दों से
खाली नज़रों तक
जब न थी कोई
आदत न फितरत
न तमन्ना न हसरत
न आरज़ू न अदा ,
फिर है ये जाल कौन सा
तकदीर का
जिस में उलझता ही
जाता है जीवन
हर साँझ थोडा
हर रात थोडा
bahana
मैं व्रत रख रहा हूँ, तुम भी रखो, कहकर छिपकर खाना सबसे बड़ा धोखा है. लोग अपनी सारी जिंदगी इसी प्रकार के अनेक धोखे देते रहते हैं. मातहतों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाकर खुद मोटी रिश्वत लेना, कार्यकर्ताओं को मरने को आगे कर खुद भेस बदलकर भागना, पत्नी-बच्चों को चरित्र पर भाषण देकर खुद लंपटता से जीना.. आदि ऐसे ही उदाहरण हैं. आपके पास कोई उदाहरण है?
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