Monday, 30 May 2011

आदत तो न थी

खाली रास्तों को
निहारना मेरी आदत तो न थी
खाली पनों को
स्याह करना मेरी फितरत तो न थी
खाली चेहरों में
रंग भरना मेरी तमन्ना
तो न थी
खाली शब्दों से
जुबां को जोड़ना मेरी हसरत तो न थी
खाली नज़रों से
ख्वाबो को बुनना मेरी आरज़ू तो न थी
खाली पलकों से
आंसू में मुस्कुराना मेरी अदा तो न थी
खाली रास्तों से
खाली पनों से
खाली चेहरों से
खाली शब्दों से
खाली नज़रों तक
जब न थी कोई
आदत न फितरत
न तमन्ना न हसरत
न आरज़ू न अदा ,
फिर है ये जाल कौन सा
तकदीर का
जिस में उलझता ही
जाता है जीवन
हर साँझ थोडा
हर रात थोडा

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