ना उम्र की सीमा हो...
दुर्ग सिंह राजपुरोहित
बाड़मेर
असहिष्णुता, हिंसा, भ्रष्टाचार और मंदी के इस दौर में देश-दुनिया की दो ताजा घटनाएं उम्मीद की तरह तो आती ही हैं, इनसे एक बार फिर पता चलता है कि उपलब्धियां उम्र की मोहताज नहीं होतीं। इनमें से एक घटना बिहार की है, जहां के एक किशोर सत्यम कुमार ने आईआईटी-जेईई की परीक्षा महज बारह की उम्र में उत्तीर्ण की है। एक निरक्षर पिता के बेटे की यह उपलब्धि इसलिए भी बहुत बड़ी है कि गरीबी के कारण खुद सत्यम को भी औपचारिक शिक्षा से वंचित रहना पड़ा!
इससे यह तो साफ होता है कि प्रतिभाएं देर-सबेर अपनी चमक बिखेरती ही हैं। हालांकि यह एक विद्रूप की ओर भी ध्यान खींचता है। वह यह कि जिस देश में प्रतिस्पर्द्धाओं की अंधी दौड़ बच्चे के पैदा होने के बाद से ही शुरू हो जाती है, वहां ऐसे भी नौनिहाल हैं, जिनकी स्कूली शिक्षा इसे मौलिक अधिकार बना देने के बाद भी रामभरोसे है।
लिहाजा सत्यम कुमार को बधाई देते हुए हमारे नीति-नियंताओं को इस बारे में भी जरूर सोचना चाहिए कि वे कौन-सी परिस्थितियां हैं, जो ग्रामीण इलाके के बहुतेरे बच्चों को स्कूलों में पहुंचने नहीं देतीं। फिर भी सत्यम की यह उपलब्धि बरबस तथागत तुलसी की याद दिलाती है, जो बाईस साल में आईआईटी, मुंबई में प्रोफेसर बन चुका है। उपलब्धि की दूसरी गाथा भी उतनी ही आश्चर्यजनक है, जिसमें एक जापानी महिला ने तिहत्तर की उम्र में एवरेस्ट को दोबारा फतह किया है।
दस साल पहले जब उन्होंने एवरेस्ट की चोटी पर कदम रखे थे, तब भी वह वहां पहुंचने वाली सबसे बुजुर्ग महिला बनी थीं। ऐसे में एक दशक बाद अपने कीर्तिमान को ध्वस्त करने के बारे में सोचना भी एवरेस्ट की कठिन चढ़ाई को दोबारा चढ़ने से कम मुश्किल नहीं रहा होगा। यह वह अवस्था होती है, जब जीवन में नएपन की कोई उम्मीद शेष नहीं रहती। लेकिन चट्टान सरीखे जीवट वाली इस महिला के जीवन में बुढ़ापा दूर-दूर तक नहीं दिखता।
ऐसे में कौन कह सकता है कि एक दशक बाद यही महिला फिर एवरेस्ट की चोटी को चूमकर हंसते-हंसते नीचे नहीं उतर आएंगी! जो लोग जापान को बूढ़ों का देश कहते हैं, उन्हें तमाई बतनाबे के साहस को गौर से देखना चाहिए। साठ की उम्र में बिस्तर, डॉक्टर और अध्यात्म तक सीमित हो जाने वाले हम भारतीयों के लिए तमाई बतनावे एक उम्मीद तो हैं ही।
| सोचो हमेशा लेकिन सकारात्मक |
असहिष्णुता, हिंसा, भ्रष्टाचार और मंदी के इस दौर में देश-दुनिया की दो ताजा घटनाएं उम्मीद की तरह तो आती ही हैं, इनसे एक बार फिर पता चलता है कि उपलब्धियां उम्र की मोहताज नहीं होतीं। इनमें से एक घटना बिहार की है, जहां के एक किशोर सत्यम कुमार ने आईआईटी-जेईई की परीक्षा महज बारह की उम्र में उत्तीर्ण की है। एक निरक्षर पिता के बेटे की यह उपलब्धि इसलिए भी बहुत बड़ी है कि गरीबी के कारण खुद सत्यम को भी औपचारिक शिक्षा से वंचित रहना पड़ा!
इससे यह तो साफ होता है कि प्रतिभाएं देर-सबेर अपनी चमक बिखेरती ही हैं। हालांकि यह एक विद्रूप की ओर भी ध्यान खींचता है। वह यह कि जिस देश में प्रतिस्पर्द्धाओं की अंधी दौड़ बच्चे के पैदा होने के बाद से ही शुरू हो जाती है, वहां ऐसे भी नौनिहाल हैं, जिनकी स्कूली शिक्षा इसे मौलिक अधिकार बना देने के बाद भी रामभरोसे है।
लिहाजा सत्यम कुमार को बधाई देते हुए हमारे नीति-नियंताओं को इस बारे में भी जरूर सोचना चाहिए कि वे कौन-सी परिस्थितियां हैं, जो ग्रामीण इलाके के बहुतेरे बच्चों को स्कूलों में पहुंचने नहीं देतीं। फिर भी सत्यम की यह उपलब्धि बरबस तथागत तुलसी की याद दिलाती है, जो बाईस साल में आईआईटी, मुंबई में प्रोफेसर बन चुका है। उपलब्धि की दूसरी गाथा भी उतनी ही आश्चर्यजनक है, जिसमें एक जापानी महिला ने तिहत्तर की उम्र में एवरेस्ट को दोबारा फतह किया है।
दस साल पहले जब उन्होंने एवरेस्ट की चोटी पर कदम रखे थे, तब भी वह वहां पहुंचने वाली सबसे बुजुर्ग महिला बनी थीं। ऐसे में एक दशक बाद अपने कीर्तिमान को ध्वस्त करने के बारे में सोचना भी एवरेस्ट की कठिन चढ़ाई को दोबारा चढ़ने से कम मुश्किल नहीं रहा होगा। यह वह अवस्था होती है, जब जीवन में नएपन की कोई उम्मीद शेष नहीं रहती। लेकिन चट्टान सरीखे जीवट वाली इस महिला के जीवन में बुढ़ापा दूर-दूर तक नहीं दिखता।
ऐसे में कौन कह सकता है कि एक दशक बाद यही महिला फिर एवरेस्ट की चोटी को चूमकर हंसते-हंसते नीचे नहीं उतर आएंगी! जो लोग जापान को बूढ़ों का देश कहते हैं, उन्हें तमाई बतनाबे के साहस को गौर से देखना चाहिए। साठ की उम्र में बिस्तर, डॉक्टर और अध्यात्म तक सीमित हो जाने वाले हम भारतीयों के लिए तमाई बतनावे एक उम्मीद तो हैं ही।
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