Wednesday, 23 May 2012

मगर अब भी ‘प्रेस’ गुलाम है




मगर अब भी ‘प्रेस’ गुलाम है                                                                             आधी शताब्दी गुजर गई हमें आजाद भारत में सांसें लेते हुए, मगर अब भी ‘प्रेस’ गुलाम है । कहीं पूंजीवादियों के हाथ में मीडिया खेल रहा है तो कहीं राजनेताओं के ईशारे पर । यही कारण है कि व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की ही तरह खबरदार पालिका भी ‘दाग’ से अछूती न रह सकी । हम कोशिश कर रहे हैं इस दाग को धोने की, आजादी से विचारों को रखने की, समाज में सच को लाने की । हम कोई दावा नहीं करते कि हम समाज के सर्वहारा वर्ग की आवाज को पूरे दम से उठाने में कामयाब होंगे लेकिन इतना जरूर है कि शापिंग माल चलाने वाले अखबारों, फिल्मसिटी की आड़ में टी.वी. चैनल चलाने वालों, भूमाफियाओं और बिल्डरों के अखबारों से, बच्चों की शिक्षा को महंगी बनाकर कालेज संचालित करके मीडिया में घुसपैठ करने वालों से बेहतर समाचार अपने चाहने वालों को देंगे ।
पेड न्यूज़ (बिकाऊ) बना देने वालों को हमारी ये वेबसाईट जवाब देगी । खबर कोई वस्तु नहीं जिसके दाम लगे और जहाँ दाम तय हो जाते हैं, वहाँ से ‘दम’ चला जाता है । हम ढाई दशकों की अपनी पत्रकारिता में ‘बेईमानी-सेटिंग’ के दाग से बचते रहे हैं, आगे भी बचने की सौगंध उठाते हैं, हम राष्ट्रहित के आगे ‘स्वहित’ का बलिदान करने को तत्पर है ।


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