Monday, 21 May 2012

ममता का डर और मनमोहन की मजबूरी

ममता का डर और मनमोहन की मजबूरी
दुर्गसिंह राजपुरोहित 
बाड़मेर मनमोहन ममता बनर्जी से इतना क्यों डरते हैं? सोनिया शरद पवार के तेवरों से क्यों सहम जाती है। मुलायम मध्यावधि चुनाव की रट लगाए हैं तो लालू ने रेल मंत्रालय पर अड़े है। केंद्र परेशान और हलकान है। करे तो क्या करे। देश चलाए या क्षेत्रीय सहयोगियों की जी हजूरी करे। हर बड़े फैसले पर क्षेत्रीय सहयोगियों की उंगली उठ जाती है। या तो सहयोगी को मनाओ या फिर फैसला बदलो। ये है 'गठबंधन धर्म' की मजबूरी। याद है आपको। कुछ साल पहले एनडीए सरकार में भी यही हाल थे। तब भी चिर कुंवारे अटल बिहारी वाजपेयी को तीन देवियों (माया-ममता-जया) ने उंगलियों पर नचाया था। आज मनमोहन नाच रहे हैं। भारतीय लोकतंत्र में राष्ट्रीय दलों की इतनी फजीहत शायद कभी नहीं हुई थी। इसका एक ही कारण है - क्षेत्रीय पार्टियों का राष्ट्रीय राजनीति में बोलबाला।
आखिर मनमोहन कब तक कठपुतली बने रहेंगे ..पहले सोनिया और अब मामता के हाथो की 

द‌ुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की केंद्र सरकार पर क्षेत्रीय नेताओं का इस कदर शिकंजा कसा है कि जान गले तक आ फंसी है। इसे साफतौर पर क्षेत्रीय दलों की तानाशाही कहेंगे जो गठबंधन राजनीति की देन है। क्षेत्रीय दलों की राज्य के प्रति जिम्मेदारी पूरी हो न हो, लेकिन केंद्र को सपोर्ट करके ये राष्ट्रीय राजनीति में दखल करने को बेताब हैं।   

राजनीति में कोई भी स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं। इसी सोच के साथ क्षेत्रीय दल हर सरकार में जोड़ तोड़ के जरिए अपनी भागेदारी पक्की कर लेते हैं। फिर शुरू होता है ब्लैकमेलिंग और दबाव का दौर। दबाव का ये दौर इतना बढ़ गया है कि देश की बड़ी नीतियों के संबंध में फैसले करते समय केंद्र सरकार इनके आगे रिरियाने के लिए मजबूर तक हो जाती है।
ममता बनर्जी को केंद्र सरकार में दखल देने की आदत है। चाहे रेल बजट पर रेल मंत्री का इस्तीफा मांगना हो या खुदरा क्षेत्र में एफडीआई का विरोध। यही नहीं एनसीटीसी मसले पर भी सरकार को ममता बनर्जी की मांग माननी पड़ी। श्रीलंका में नरसंहार मसले पर जेनेवा में वोटिंग मसले पर भी मनमोहन सिंह को ममता और करुणानिधि के आगे झुकना पड़ा। ठीक इसी तरह ममता एनडीए सरकार में अपनी जिदें मनवा चुकी है। करुणानिधि और जयललिता भी केंद्र सरकार के मामलों में दखल देने के लिए मशहूर हैं।
जरा गौर कीजिए। अधिकतर राज्यों में क्षेत्रीय दलों की सरकार। राष्ट्रीय पार्टियां या तो सहयोगी या मूक दर्शक की भूमिका में है। राष्ट्रीय पार्टियों में कद्दावर क्षेत्रीय नेताओं का अभाव हो गया है। वो नेता जो अपने दम पर राज्यों की एक तिहाई सीटें जितवा देते थे। राष्ट्रीय दलों का जनता से संवाद खत्म हो रहा है। क्षेत्रीय जड़ों से राष्ट्रीय दल कटते जा रहे हैं। यूपी में कांग्रेस और भाजपा का सफाया इसका उदाहरण है। एक ऐसा संकेत कि यदि ध्यान न दिया तो जल्द ही केंद्र में भी सफाया होना निश्चित है। प्रत्यक्ष तौर पर क्षेत्रीय वर्चस्व की शुरूआत तमिलनाडु में हुई। यहां सी एन अन्नादुरई ने 1967 में कांग्रेस को पटखनी देकर सत्ता हथिया ली। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम की इस लहर से करूणानिधि, एम जी रामचंद्रन और जे जयललिता जैसे कई दिग्गज बहकर जनता के बीच आए। इन दिग्गजों के आगे राष्ट्रीय दल तमाशाबीन बनकर रह गए। राज्य की पूरी राजनीति इन्हीं क्षत्रपों के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई।

इसके तुरंत बाद पंजाब में अकालियों का उदय हुआ और जम्मू कश्मीर में अब्दुल्ला तो शुरूआत से ही समानान्तर सरकार चला रहे थे। 80 के दशक में आंध्र में एनटी रामाराव का अवतार इस लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण रहा। 70 के दशक में इंदिरा की खिलाफत करने वाले आंदोलन ने कालांतर में उत्तर प्रदेश और बिहार में क्षेत्रीय पार्टियों की नींव रखी।

90 के दशक से कुछ पहले यानी 1989 में क्षेत्रीय दलों की एकता रंग लाई और केंद्र में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी। हालांकि सरकार कम ही समय चल पाई लेकिन इसने कई प्रादेशिक पार्टियों को जन्म और मजबूती दी। संयुक्त मोर्चे की सरकारों ने क्षेत्रीय दलों को दिल्ली तक पहुंचने का रास्ता दिखाया। इसी रास्ते पर चलकर आज क्षेत्रीय पार्टियां दिल्ली पहुंच चुकी हैं।

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