Sunday, 20 May 2012

हिन्दी सिनेमा के सौ साल और हिन्दी


हिन्दी सिनेमा के सौ साल और हिन्दी
क्या सिनेमा अपने असली मुकाम को नहीं पा सका हैं ?
दुर्ग सिंह राजपुरोहित 
आखिर कब तक पाश्चात्य और क्षेत्रीय भाषाओं का रीमेक करता रहेगा हिंदी सिनेमा 

 कभी देश के कोने कोने में हिन्दी के विस्तार का श्रेय हिन्दी फिल्मों को दिया जाता था लेकिन बदलते वक्त में नए अंग्रेजी पसंद करने वाले अभिनेता-अभिनेत्रियों के लिए अब हिन्दी फिल्मों में संवाद रोमन में लिखे जाने लगे ताकि वे आसानी से उसे पढ सकें। इसके अलावा क्रेडिट लाइन और प्रचार सामग्री तो रोमन में ही प्रदर्शित की जाती है।मशहूर निर्माता निर्देशक बासु भट्टाचार्य ने कहा था, हिन्दी का सौभाग्य है कि वह देश के कोने कोने में बोली जाती है लेकिन यह दुर्भाग्य है कि भारत के किसी भूभाग में वह अपनी आत्मीयता स्थापित नहीं कर पाई है। जिन प्रदेशों में प्रादेशिक भाषाएं फल फूल रही है, उन क्षेत्रों में किसी को हिन्दी की ओर नजार उठाकर देखने की भी फुरसत नहीं है। ऐसी स्थिति में उसे अपने बल पर खड़ा होना होगा।  
त्रिलोक जैतली ने गोदान के निर्माता निर्देशक के रूप में जिस प्रकार आर्थिक नुकसान का ख्याल किए बिना प्रेमचंद की आत्मा को सामने रखा, वह आज भी आदर्श है। गोदान के बाद ही साहित्यिक कृतियों पर आधारित फिल्मों का मार्ग प्रशस्त हुआ। इसी श्रृंखला में शतरंज के खिलाड़ी भी ऐसी ही एक फिल्म थी।
फणीश्वरनाथ रेणु की बहुचर्चित कहानी मारे गए गुलफाम पर आधारित फिल्म तीसरी कसम हिन्दी सिनेमा में कथानक और अभिव्यक्ति का सशक्त उदाहरण है। ऐसी फिल्मों में बदनाम बस्ती, अषाढ़ का दिन, सूरज का सातवां घोड़ा, एक था चंदर.एक थी सुधा, सत्ताइस डाउन, रजनीगंधा, सारा आकाश भी शामिल है।
फिल्म समीक्षक हसनैन साजिद रिजवी ने कहा कि फिल्म जगत में एक वर्ग का आज भी दावा है कि हिन्दी फिल्मों ने हिन्दी की जो सेवा की, उसके प्रचार प्रसार में जो योगदान दिया, उसे नजरंदाज करना मुमकिन नहीं। देश के कोने कोने में आज हिन्दी का जो विस्तार दिखाई दे रहा है, उसके पीछे हमारी फिल्में ही हैं।
हसनैन ने कहा कि दूसरा पक्ष यह पूछ बैठता है कि हिन्दी भाषा के इतने दर्शकअगर नहीं मिलते तब क्या हिन्दी में इतनी फिल्मों को निर्माण होता। हिन्दी तब से बोली जाती हैं जब फिल्मों का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था। भाषा के साथ फिल्मों का कोई खास संबंध नहीं होता है, आज भी लोग मगन होकर सत्यजित राय और मृणाल सेन की फिल्में देखते हैं। लेकिन इन फिल्मों को देखने से कोई बंगला भाषा में प्रवीण नहीं हो जाता है।
उन्होंने ने कहा कि आज काफी संख्या में ऐसे अभिनेता-अभिनेत्रियां हैं जो दूसरे मुल्कों और परिवेश से आकर बॉलीवुड में काम कर रही हैं। कट्रीना कैफ, काल्की कोचलिन, जैकलिन फनाडिस, सन्नी लियोन, लिजा रे, जरीन खान, जिया खान, फ्रीडा पिंटो आदि दूसरे देश से आई हैं लेकिन काफी हिन्दी फिल्मों में काम कर रही है। हिन्दी फिल्मों की स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि ऐसे कलाकारों के लिए हिन्दी फिल्मों में प्रयोग में आने वाले संवाद अब रोमन में लिखे जाते हैं। क्रेडिट टाइटल और प्रचार सामग्री भी अंग्रेजी में होती है। देवदास, बन्दिनी, सुजाता और परख जैसी फिल्में उस समय बाक्स आफिस पर उतनी सफल नहीं रहने के बावजूद फिल्मों के भारतीय इतिहास के नए युग की प्रवर्तक मानी जाती हैं।
आज लोगों को धरती के लाल और नीचा नगर जैसी फिल्मों का इंतजार है जिसके माध्यम से दर्शकों को खुली हवा का स्पर्श मिले और अपनी माटी की सोंधी सुगन्ध, मुल्क की समस्याओं एवं विभीषिकाओं का आभास हो।

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